Wednesday, 11 September 2019

पड़ोसी मुल्‍क के पाव-पाव सेर वाले एटम बम और हमारे ढाई-ढाई सौ ग्राम के वरिष्‍ठ पत्रकार, है कोई समानता ?

जैसे पड़ोसी मुल्‍क में पाव-पाव भर तथा आधा-आधा सेर के ‘परमाणु बम’ हैं, उसी प्रकार हमारे यहां ढाई-ढाई सौ ग्राम और आधा-आधा किलो के ‘वरिष्‍ठ पत्रकार’ हैं।
आप चाहें तो पूछ सकते हैं कि इन वरिष्‍ठ पत्रकारों की तुलना पड़ोसी मुल्‍क के परमाणु बमों से क्‍यों ?
तो इसका जवाब यह है कि जितने खतरनाक पड़ोसी मुल्‍क के ‘चवन्‍नी छाप’ परमाणु बम हैं, उससे ज्‍यादा नहीं तो कम खतरनाक ढाई-ढाई सौ ग्राम वाले हमारे ‘वरिष्‍ठ पत्रकार’ भी नहीं हैं।
दरअसल इन वरिष्‍ठ ‘युवा’ पत्रकारों में इतनी एनर्जी है, इतने विस्‍फोटक तत्‍व भरे हुए हैं कि पता नहीं ये कब, कहां और कैसे फट पड़ें।
अब जाहिर है कि फटेंगे तो किसी न किसी का नुकसान जरूर होगा।
मैं यहां पहले यह क्‍लीयर और कर दूं कि स्‍वतंत्र भारत में अब कोई ‘कनिष्‍ठ’ पत्रकार शायद ही शेष हो। आप मान सकते हैं कि इस किस्‍म की नस्‍ल विलुप्‍त न सही, विलुप्‍त प्राय तो हो ही चुकी है।
ऐसी धारणा बनाने का एक ठोस आधार यह है कि तीन दशक की सक्रिय पत्रकारिता में मुझे कहीं कोई ‘कनिष्‍ठ’ पत्रकार ढूंढे नहीं मिला।
18-20 का कोई एक हो या 20-20 के दो रहे हों, सबके सब वरिष्‍ठ पत्रकार ही पाए गए लिहाजा इस शोध से यह भी ज्ञात हुआ कि इस वरिष्‍ठता से उम्र का कोई नाता दूर-दूर तक नहीं है।
उदाहरण के लिए एक 55-60 साला पत्रकार यदि ऐसी ‘छोटी सोच’ रखता हो कि पत्रकारिता में हर वक्‍त कुछ न कुछ सीखने की गुंजाइश है, तो वह कभी ‘वरिष्‍ठ’ नहीं हो सकता।
ठीक इसके उलट जीवन के मात्र 35 वसंत देखने वाला कोई पत्रकार अगर यह ठान बैठे कि उसे किसी नई जानकारी की आवश्‍यकता नहीं है, उसके पास पत्रकारिता का ज्ञान बघारने को पर्याप्‍त मसाला एकत्र हो चुका है तो उसका ‘स्‍वयंभू’ वरिष्‍ठ हो जाना बनता है।
इसे समझने के लिए मैं खुद को पेश करता हूं। मुझे 01 सितंबर (जिस दिन से देश में नया व्‍हीकल एक्‍ट लागू हुआ) से पहले तक कतई पता नहीं था कि ‘गेयर वाला’ कोई ‘दुपहिया वाहन’ चप्‍पलें पहनकर, लुंगी या तहमद बांधकर… और यहां तक कि ‘निक्‍कर’ आदि पहनकर चलाने पर भी चालान कट सकता है।
चंद्रयान-2 की आंशिक असफलता से पूर्व मैंने नहीं पढ़ा था कि ‘लैंडर’ की भूमिका क्‍या होती है और क्‍यों उसका टेढ़ा-तिरछा होना पूरे देश पर भारी पड़ सकता है।
अर्थशास्‍त्र का विद्यार्थी होने के बावजूद मैंने कभी देश की अर्थव्‍यवस्‍था को लेकर ‘अर्थशास्‍त्रियों’ को चुनौती नहीं दी, कभी जीडीपी को लेकर निरर्थक बहस नहीं की। ‘रेपो रेट’ में बाल की खाल निकालना जरूरी नहीं समझा।
अब आप ही बताइए कि मैं कैसे वरिष्‍ठ हो सकता हूं जबकि मुझसे काफी छोटे पत्रकार सीधे-सीधे दिन रात चिल्‍ला-चिल्‍लाकर कहते हैं… देश को मंदी के गर्त में ले जानी वाली सरकार बताए कि उसने समय रहते इसे रोकने के उपाय क्‍यों नहीं किए। वित्तमंत्री को मंदी का पता तब क्‍यों चला, जब मीडिया ने उसे बताया कि मंदी की मार से आमलोग बेहाल हो रहे हैं।
वो बेखौफ होकर ये भी बताते हैं कि ऑटो इंडस्ट्री की इतनी खस्‍ता हालत कैसे बनी, ‘कारें’ क्‍यों नहीं बिक रहीं। ‘लिपिस्‍टिक’ ज्‍यादा बिकने से क्‍या संदेश मिलता है।
औरतें मंदी की मार को ठेंगा दिखाने के लिए कार की बजाय लिपिस्‍टिक, नेल कलर या हेयर बैंड खरीदने लगती हैं।
ये पत्रकार अर्थशास्‍त्रियों को बताते हैं कि औरतों का अचानक कारों पर से ध्‍यान हटाकर सीधे लिपिस्‍टिक, नेल कलर या हेयर बैंड पर फोकस करना इस बात का पुख्‍ता सबूत है कि आर्थिक मंदी घर कर चुकी है।
दुनियाभर के अर्थशास्‍त्री एक तरफ और वरिष्‍ठ पत्रकार दूसरी तरफ।
अर्थशास्‍त्री उनकी दृष्‍टि से घिसी-पिटी दलीलें देकर देश के साथ अनर्थ कर रहे हैं जबकि देश गर्त में जाने की ओर तेजी के साथ बढ़ रहा है।
कुछ वरिष्‍ठ पत्रकारों के पास तो इस बात के पुख्‍ता सबूत भी हैं कि देश गर्त में जा चुका है, बस घोषणा होना बाकी है।
इन वरिष्‍ठ पत्रकारों की मानें तो देश उसी प्रकार बेढंगे तरीके से पृथ्‍वी पर खुद की मौजूदगी का अहसास जबरन कराने में जुटा है, जिस प्रकार के. सिवन विक्रम लैंडर के चंद्रमा पर तिरछा जा पड़ने का अहसास करा रहे हैं।
कुछ ने तो के. सिवन को चुनौती देने के लिए इस आशय का खुला पत्र लिखकर तैयार रखा है कि जब आज तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर किसी ने अपना यान उतारने की कोशिश नहीं की तो आपने ये हिमाकत क्‍यों की।
क्‍यों देश का सेंकड़ों करोड़ रुपया बर्बाद कर दिया। इतने रुपयों से कितने वर्ष का मिड डे मील आ सकता था। किसानों के गन्‍ने का बकाया भुगतान किया जा सकता था। उनका कर्ज माफ किया जा सकता था। बीएसएनएल के कर्मचारियों का रुका हुआ वेतन दिया जा सकता था। ऐसा ही बहुत कुछ किया जा सकता था जो आपकी जिद की भेंट चढ़ गया।
एक वरिष्‍ठ पत्रकार तो यहां तक कह रहे थे कि हम आरटीआई के जरिए ISRO चीफ से ये जानकारी मांगेंगे कि क्‍या वो खुद कभी अंतरिक्ष की सैर पर निकले थे, और नहीं निकले तो उन्‍होंने एक अनजान व अज्ञात सफर पर देश का चंद्रयान-2 कैसे भेज दिया।
कल को कोई वरिष्‍ठ पत्रकार किसी ‘खास वकील’ के माध्‍यम से कोर्ट में ISRO चीफ के खिलाफ याचिका लेकर पहुंच जाए तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए।
इन हालातों में मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि मैं अपनी तीन दशक की पत्रकारिता को ओढूं या बिछाऊं।
क्‍या के. सिवन को यहीं ISRO में छोड़कर चंद्रमा तक जाकर पता लगाऊं कि ऑर्बिटर के बारे में भी वो जो कुछ बता रहे हैं, वो सही है या नहीं।
या मैं भी आरटीआई भेजकर सरकार से पूछूं कि पाकिस्‍तान के पाव-पाव भर वाले एटम बमों और हमारे ढाई-ढाई सौ ग्राम के वरिष्‍ठ पत्रकारों में कोई समानता है। है तो उसकी विस्‍तृत जानकारी उपलब्‍ध कराएं।
मुझे लगता है कि मैं मूढ़ था, मूढ़ हूं और ताजिंदगी मूढ़ ही रहूंगा। किसी ने मेरे जैसे ‘कनिष्‍ठ’ पत्रकारों के लिए उचित ही कहा है-
सबसे भले हैं मूढ़, जिन्‍हें न प्‍यापै जगत गति
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

Friday, 30 August 2019

“गूंगे” ने “बहरे” से जो कुछ कहा, उसे “अंधे” ने देखा

चकरा गए न! मैं भी इसी प्रकार चकरा गया था जब उसने बिना किसी राम-राम या दुआ-सलाम के सीधे-सीधे मुझसे यही कहा था।
मैंने उससे कुछ बेरुखी के साथ पूछा- ये क्‍या बक रहे हो। ऐसा कैसे संभव है ?
वह भी उतनी ही बेरुखी बरतते हुए प्रत्‍युत्तर में बोला- संभव हो या असंभव… मुझे इससे क्‍या ?
मैं तो संविधान प्रदत्त अपनी अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का इस्‍तेमाल कर रहा हूं। इससे तुम्‍हें आपत्ति क्‍यों हो रही है?
इस बार मैंने उसे समझाने की कोशिश की- भाई मेरे, यह अभिव्‍यक्‍ति की आजादी नहीं हैं। इसे अफवाह फैलाना कहते हैं, और अफवाह फैलाना एक जुर्म है। अफवाह फैलाने वाले देश के दुश्‍मन होते हैं।
मेरे समझाने पर वह और भड़क उठा। कहने लगा- तुम इसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हो। ये है तुम्‍हारा लोकतंत्र, जहां मुझसे मेरी बोलने की आजादी छीनी जा रही है।
बोलने की ही क्‍यों… मेरे रहन-सहन की आजादी, खाने-पीने की आजादी, और तो और घूमने-फिरने की भी आजादी पर पाबंदी लगाई जा रही है।
मैंने उसकी भावनाओं का आदर करते हुए उससे यह जानने की कोशिश की कि आखिर तुम चाहते क्‍या हो, थोड़ा विस्‍तार में बताओ।
इस पर वह बोला- देखिए जनाब, मैं सिर्फ संविधान से प्राप्‍त अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्‍तेमाल करना चाहता हूं। और इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
मुझे मेरे भरोसेमंद सूत्रों ने जानकारी दी कि “गूंगे” ने “बहरे” से जो कुछ कहा, उसे “अंधे” ने देखा। अब मैं इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगों के बीच फैला देना चाहता हूं लेकिन आप जैसे लोग हैं कि मेरी जुबान पर भी लगाम लगाना चाहते हैं।
यह सुनकर अब मेरा धैर्य थोड़ा चुकने लगा तो मैंने उससे कहा- देखो भाई… संविधान ने बेशक देश के सभी नागरिकों को अभिव्‍यक्‍ति की, रहन-सहन की, खाने-पीने की और घूमने-फिरने की भी आजादी दी है परंतु हर आजादी की कोई सीमा तो होती ही है न।
संविधान में ऐसी किसी सीमा का कोई उल्‍लेख भले न हो परंतु इसके लिए हमें अपने बुद्धि-विवेक का प्रयोग खुद करना होता है। जो लोग खुद नहीं करते, उन्‍हें कानून कराता है। या यूं कहें कि कानून को कराना पड़ता है क्‍योंकि कोई भी आजादी अराजकता फैलाने का अधिकार नहीं देती।
जैसे कि अभिव्‍यक्‍ति की आजादी के नाम पर कोई खुलेआम किसी को गाली तो नहीं दे सकता क्‍योंकि गाली देना अपराध कहलाता है। लोगों को भड़काने-उकसाने का काम भी नहीं कर सकता क्‍योंकि वह भी अपराध की श्रेणी में आता है।
इसी प्रकार संविधान ये भी अधिकार नहीं देता कि आप मुंह में हर वक्‍त पेट्रोल भरकर घूमते रहें ताकि जहां भी चिंगारी नजर आ जाए वहीं उसे आग के शोलों में तब्‍दील कर सकें। आप ऐसा करेंगे तो कानून भी अपना काम करेगा।
रहन-सहन की आजादी भी लोकतंत्र देता है परंतु इसका भी यह मतलब नहीं कि आप निर्वस्‍त्र निकल पड़ें और किसी के रोकने-टोकने पर दुहाई देने लगें संविधान की।
सरेआम निर्वस्‍त्र निकल पड़ने पर आपके साथ दो किस्‍म की दुर्घटनाएं हो सकती हैं। पहली कानून सम्‍मत और दूसरी वो जिसे आप जैसे लोग अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता कहते हैं। मसलन जनता जनार्दन आपको ”पगलैट” समझकर दौड़ा सकती है। आपके ऊपर ईंट-पत्‍थर फेंक सकती है या ऐसा कुछ कर सकती है जिसे आप जैसा ”इलीट वर्ग” मॉब लिंंचिंग कहता है और आम आदमी जनाक्रोश। चुनाव आपका है, आप जिस तरह भी समझ सकें।
इसके बाद नंबर आता है खाने-पीने की आजादी का। तो भाई यहां भी कानूनन तय है कि आप कितनी आजादी के हकदार हैं। आप अपने घर में बैठकर निरामिष भोजन करें या आमिष यानी मांसाहारी अथवा शाकाहारी, ये आपका अधिकार है परंतु यदि आप कहें कि मैं तो बीच सड़क पर उसे काटकर और पकाकर ”गिद्ध-भोज” करूंगा तो ये अधिकारों का दुरुपयोग ही नहीं, कुत्‍सित एवं कुंठित मानसिकता का परिचायक भी होगा।
आपको अपने घर या कुछ निर्धारित स्‍थानों पर मदिरापान करने की भी आजादी है परंतु सार्वजनिक तौर पर नहीं।
आपको यह आजादी भी नहीं कि आप मदिरापान करके मनमर्जी करने लगें। किसी के भी कपड़े फाड़ दें या अपने कपड़े फाड़कर समाज को शर्मिंदा करें, क्‍योंकि लिमिट सबकी तय है। लिमिट क्रॉस की नहीं कि कानून अपना काम करने लगता है।
शेष रह जाती है बात घूमने-फिरने की आजादी की तो उसके लिए भी कहीं कोई रोक-टोक नहीं है, परंतु विषम परिस्‍थितियों में शांति व सद्भाव बनाए रखने के लिए कानून में ऐसे प्रावधान हैं जिनका इस्‍तेमाल किया जा सकता है।
ऐसा इसलिए कि संविधान और लोकतंत्र ने सिर्फ अधिकार ही नहीं दिए, कुछ कर्तव्‍य भी निर्धारित किए हैं।
इन कर्तव्‍यों में हर इंसान के जीवन की रक्षा करना भी शामिल है। इसीलिए जीवन जीने का अधिकार तो सबको है परंतु जीवन लेने का किसी को नहीं। चाहे वह आपका खुद का ही क्‍यों न हो। ऐसा न होता तो ”खुदकुशी” भी अपराध न होता। वह एकमात्र ऐसा अपराध है जिसमें सफल हो जाने पर तो आदमी कानून से बच निकलता है परंतु असफल रहने पर शिकंजे में फंस जाता है।
आप कल को यह कहने लगें कि भाई जब जीवन मेरा है तो उसे छीनने का अधिकार मुझे क्‍यों नहीं है।
कुछ गुणी लोग इसके लिए कानून को चुनौती देते रहे हैं और देते रहेंगे किंतु फिलहाल खुदकुशी करने की कोशिश अथवा उसके लिए प्रेरित करना दोनों ही कृत्‍य अपराध हैं।
तो यार, न खुद खुदा से मिलने की इतनी जल्‍दी में रहो और न दूसरों को उसके लिए उकसाओ।
संविधान और लोकतंत्र से मिले अधिकारों का सम्‍मान करो व उनका लुत्‍फ उठाओ। अपमान करोगे तो अपमानित होना पड़ेगा।
संविधान प्रदत्त अधिकार हों या लोकतंत्र प्रदत्त, उनकी व्‍याख्‍या अपने मनमाफिक करने की कोशिश भी आत्‍मघात से कम नहीं है।
जितनी आजादी और जैसी आजादी मिली है, उसके लिए शुक्रिया अदा करो संविधान निर्माताओं का, लोकतंत्र का और उस जनता जनार्दन का जो तुम्‍हें ‘झेल’ रही है।
कानून को अपना काम करने दो क्‍योंकि वो भी संविधान की देन है। उसे भी आपके ही पूर्वजों ने स्‍थापित किया है। समय और परिस्‍थितियों को समझो।
सब-कुछ संविधान प्रदत्त नहीं होता, कुछ ईश्‍वर प्रदत्त भी होता है। ईश्‍वर ने बुद्धि-विवेक दिया है तो उसका भी थोड़ा इस्‍तेमाल कर लो और फिर सोचो कि क्‍या गूंगा बोल सकता है, क्‍या बहरा सुन सकता है, क्‍या अंधा देख सकता है ?
नहीं न…तो फिर ऐसी अफवाहें क्‍यों फैलाते हो। क्‍यों अभिव्‍यक्‍ति की आजादी का ढोल गले में लटकाकर देश का ढोल बजाने में लगे रहते हो।
क्‍यों रहने-खाने-पीने-घूमने-फिरने की आजादी के बहाने अपने दिमाग का दिवालियापन जाहिर करते हो।
याद रखो… ये जो जनता है, सब जानती है। तुम्‍हें भी और तुम्‍हारी हरकतों को भी।
कहते हैं किसी खास जीव को ”घी” हजम नहीं होता। बाकी आप समझदार हैं।
डिस्‍क्‍लेमर: यह कहावत हर उस व्‍यक्‍ति पर खरी उतर सकती है जो प्राप्‍त सुविधाओं का दुरुपयोग करने में लगा रहता है। सिर्फ अधिकारों की बात करता है, कर्तव्‍यों की नहीं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

Friday, 23 August 2019

बेचारे ‘खिलाड़ी’ को ‘मदारी’ ने “लॉलीपॉप” दिखाकर बना दिया “बड़े वाला”

बेचारे मियां बड़ी हसरतों के साथ झोली उठाकर अमेरिका पहुंचे थे। सोच रहे थे कि ”दे दाता के नाम तुझको अल्‍ला रखे” की तर्ज पर उससे फरियाद करेंगे और झोली भरकर लौट आएंगे।
उन्‍हें शायद इस बात का इल्‍म ही नहीं था कि अमेरिका में उनका वास्‍ता सृष्टि के जिस जीव से पड़ने वाला है, वह राष्‍ट्रपति होने से पहले बहुत स्‍याना व्‍यापारी भी है। वह उनकी तरह खिलाड़ी नहीं है, मदारी है।
मदारी ने खिलाड़ी को दूर एक लॉलीपॉप दिखाई, और कहा कि यदि तुम तालिबान को हमसे समझौता वार्ता की टेबल पर ले आओ तो वह लॉलीपॉप तुम्‍हारी। लॉलीपॉप देखकर मियां इमरान के मुंह में पानी आ गया। लार टपकने लगी।
टपकती लार लेकर अपने मुल्‍क वापस लौटे तो बोले, ऐसा लग रहा है जैसे विश्‍वकप जीतकर आया हूं।
इधर जब भारत को पता लगा कि मदारी ने खिलाड़ी को उंगली के इशारे से लॉलीपॉप दिखा दी है तो भारत के मुखिया ने सबसे पहले मदारी को दो टूक समझाया।
कहा, देखो जनाब…प्रथम तो हम अपने पड़ोसी की तरह टाइमपास नेता नहीं हैं। और दूसरे गुजराती हैं। अगर राजनीति को व्‍यापार समझने की भूल कर रहे हो तो भी जान लो कि व्‍यापार हमारे रग-रग में बसा है। जिस लॉलीपॉप को दिखाकर तुम मियां इमरान से सौदेबाजी करने में लगे हो, वैसी लॉलीपॉप तो हम चाट-चाट कर फेंक देते हैं।
इतना कुछ कहने के बाद भी भारत को कुछ मजा नहीं आया। संतुष्‍टि नहीं मिली, तो उसने सोचा कि क्‍यों न खिलाड़ी और मदारी दोनों को एक जोर का झटका दिया जाए।
बताया जाए कि कुल जमा चार सौ साल की उम्र वाले एक देश और मात्र 70-72 साल के एक मुल्‍क की सोच पर हजारों साल पुराना भारत कितना भारी पड़ सकता है।
भारत ने एक झटके में लॉलीपॉप की डंडी तोड़ी और उसे नाली में फेंक दिया। जैसे कह रहा हो कि लो अब उठा सको तो उठा लो। अब दोनों मिलकर कचरे में ढूंढते रहना लॉलीपॉप को लेकिन लॉलीपॉप मिलने से रही क्‍योंकि जब तक तुम उसे ढूंढने नाली में उतरोगे तब तक वह गलकर बराबर हो लेगी।
भारत की इस चाल को न तो खुद को खुदा समझने वाला मदारी समझ पाया और न उसकी उंगली पर नाचने वाला जमूरा। एक झटके में सारी स्‍यानपत निकाल दी भारत ने। ऊपर से इस्‍लामाबाद में पोस्‍टर और लगवा दिया कि अब पीओके को संभाल सको तो संभालो। वैसे वो है तो हमारा ही, इसलिए लेकर भी हम ही रहेंगे।
अब बेचारा मदारी अपनी सफाई देने में लगा है और खिलाड़ी को उसके देश में लानत झेलनी पड़ रही है। लोग खुलेआम कह रहे हैं कि मियां… तुमसे ना हो पाएगा।
तुम तो सरकारी आवास को बारात घर बनाने और कबाड़ बेचकर जुगाड़ करने के ही लायक हो। कबाड़ बेचकर अपना घर भले ही चला लेना, पर देश यूं न चला करता। उसके लिए चाहिए अच्‍छा-खासा दिमाग, दिमाग तुम्‍हारे पास है नहीं। ऐसे में लॉलीपॉप को दूरबीन से देख तो सकते हो, लेकिन उसका स्‍वाद चखने को नहीं मिलना।
खैर, अब तो न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम। ऊपर से जलते तवे पर तसरीफ का टोकरा भी रखना पड़ रहा है। जब फुरसत मिले तो किसी कोने में जाकर तसरीफ पर पड़े फफोले चैक कर लेना। फिर बताना कि कितने हैं। मरहम हम भेज देंगे। आहिस्‍ता-आहिस्‍ता मलते रहना तब तक, जब तक कि मियां नवाज शरीफ के बग़लगीर न हो जाओ। खुदा खैर करे।
क्‍योंकि तुम्‍हारे ही लोग अब तो तुम्‍हारे मुंह पर थूककर कहने भी लगे हैं कि तुम्‍हें मदारी ने बड़े वाला बना दिया मियां।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

Friday, 23 October 2015

मैं भी मोदी जी के खिलाफ एक केस दर्ज करवा ही दूं

सोच रहा हूं कि बहती गंगा में हाथ धोते हुए मोदी जी के खिलाफ मैं भी एक केस दर्ज करवा ही दूं।
दरअसल, आज टीवी के एक विज्ञापन पर अचानक मेरी नजर गई। एक खास चाय कंपनी के इस विज्ञापन में अपने बुजुर्ग सहित बैठा अल्‍पसंख्‍यक समुदाय का एक बच्‍चा चाय को देखकर पूछता है कि क्‍या ये चाय सिर्फ उस्‍तादों के लिए है?
इसी दौरान चाय के दामों में कमी को दर्शाते हुए चाय पेश करने वाला कहता है कि नहीं…यह चाय सबके लिए है।
सवाल करने वाले बच्‍चे के हाथ में वह कांच का सस्‍ता सा ढाबे पर मिलने वाला चाय से भरा गिलास थमा देता है।
मेरी दृष्‍टि से यह मोदी राज में गरीबों का इरादतन किया गया अपमान है और वो भी एक वर्ग विशेष के लोगों को टारगेट करके किया गया है। मुझे इसमें संघ के एजेंडे की बू आती है।
मन कर रहा है कि पहले तो कांग्रेस के चिर युवा राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी जी को मोदी सरकार की इस हरकत तथा आरएसएस की मंशा से अवगत करा दूं ताकि वह समय रहते विज्ञापन में दर्शाए गए अल्‍पसंख्‍यक बंधुओं के घर जाकर उन्‍हें सांत्‍वना दे सकें और फिर किसी कोर्ट में याचिका दाखिल करके तत्‍काल मोदी सरकार के खिलाफ सख्‍त कार्यवाही कराने में लग जाऊं।
कुछ अक्‍ल से पैदल लोग इस आशय का सवाल खड़ा कर सकते हैं कि एक प्राइवेट कंपनी की चाय के विज्ञापन से मोदी जी या उनकी सरकार का क्‍या लेना-देना।
मेरा ऐसे सभी कालीदासों को एक ही जवाब है कि देश के एक अदद प्रधानमंत्री चूंकि मोदी जी हैं इसलिए मामला किसी प्राइवेट कंपनी की चाय का हो या उसमें मिले दूध को देने वाली भैंस का, जिम्‍मेदार तो मोदी जी ही हैं क्‍योंकि मोदी जी इस देश के सवा सौ करोड़ लोगों सहित उन जीव-जंतुओं के भी प्रधानमंत्री हैं जिन्‍हें बिना किसी कागजात के भारतीय होने का जन्‍मसिद्ध अधिकार प्राप्‍त है।
ऐसे में चाय कंपनी और उसके द्वारा दिए गए विज्ञापन के लिए मोदी जी की सीधी जिम्‍मेदारी बनती है क्‍योंकि प्रश्‍न किसी निजी या सरकारी कंपनी का नहीं है, प्रश्‍न प्रधानमंत्री होने का है। इन हालातों में मोदी जी पर मेरे द्वारा मुकद्दमा दर्ज कराना बनता है।
इसी तरह कुछ सिरफिरे लोग कहते हैं कि दादरी की घटना से मोदी जी की सरकार का क्‍या वास्‍ता।
मैं पूछना चाहता हूं कि दादरी किस प्रदेश में है….उत्‍तर प्रदेश में ना। और उत्‍तर प्रदेश किस देश में है…भारत में ना। भारत के प्रधानमंत्री कौन हैं…मोदी जी ना।
अब आप ही बताइए कि उत्‍तर प्रदेश का दादरी की घटना से कोई मतलब रह जाता है क्‍या। सारा मतलब तो मोदी जी का ही है।
सही कहते हैं यूपी के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव कि उत्‍तर प्रदेश को बीच में घसीटना विरोधियों की साजिश का हिस्‍सा है।
अखिलेश की इस बात में भी दम है कि उत्‍तर प्रदेश ने उनके राज में जितना विकास किया है, उतना तो आज तक किसी राज में हुआ ही नहीं लिहाजा जल-भुनकर कुछ शरारती तत्‍व (जस्‍ट लाइक मोदी जी) उनकी सरकार को लॉ एंड ऑर्डर के नाम पर बदनाम कर रहे हैं।
इतिहास ही नहीं, मैं भी गवाह हूं कि अखिलेश के राज में उत्‍तर प्रदेश ने जो मुकाम हासिल किया है, वह न तो कोई आज तक कर पाया और न भविष्‍य में किसी के द्वारा कर पाने की उम्‍मीद है।
पूरा समाजवादी कुनबा जिसमें मात्र डेढ़ दर्जन लोग हैं, उत्‍तर प्रदेश के उत्‍तरोत्‍तर विकास में सतत् प्रयत्‍नशील हैं। है कोई माई का लाल जिसके परिवार से पूरे 18 लोग अपने प्रदेश की सेवा कर रहे हों।
प्रदेश तो छोड़िए देश में ही बता दीजिए।
मोदी जी से तो इसका जिक्र तक करना बेकार है। जो अपनी एक अदद बीबी को छोड़कर राजनीति करने चले आए वो क्‍या समझेंगे कि मुलायम के समाजवाद में बहुविवाह केवल किया ही इसलिए जाता है जिससे भरे-पूरे परिवार के साथ प्रदेश और संभव हो तो देश सेवा की जा सके।
मैं यहां स्‍पष्‍ट कर देना चाहता हूं कि समाजवादियों द्वारा की जा रही देश की सेवा में मोदी जी का कोई हाथ नहीं है। हालांकि समाजवादी कुनबे को लेकर मोदी जी के मुलायम रवैये पर कुछ विरोधी शंका करते हैं परंतु उनकी शंका निराधार है। मोदी जी उत्‍तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था के लिए जिम्‍मेदार हैं और रहेंगे परंतु उत्‍तर प्रदेश की सरकार चलाने वाले समाजवादी कुनबे के निजी कामकाज में उनका कोई हस्‍तक्षेप नहीं है। इसकी पुष्‍टि संभवत: मुलायम सिंह और अखिलेश यादव भी कर देंगे।
इधर दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री माननीय श्री अरविंद केजरीवाल को दिल्‍ली की पुलिस अपने अधीन चाहिए। पुलिस न हुई शोले का ठाकुर हो गया जिससे गब्‍बर कहता है- ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर…ये हाथ मुझे दे दे।
केजरीवाल की मानें तो पुलिस मिलते ही वह पूरी दिल्‍ली को सुधार कर रख देंगे।
केजरीवाल ने दबी जुबान से कहा भी है कि मोदी कितनी ही विदेश यात्राएं कर लें, लौटना तो दिल्‍ली ही होता है। एकबार पुलिस मेरे हाथ आ गई तो मोदी जी मेरे हाथ अपने आप आ जायेंगे।
केजरीवाल के अनुसार वह शीला दीक्षित नहीं हैं जो चुप होकर बैठ जायेंगे। वह मोदी जी को तब तक चैन से नहीं सोने देंगे जब तक दिल्‍ली पुलिस उन्‍हें नहीं सौंप दी जाती।
केजरीवाल जी को कौन समझाए कि दिल्‍ली पुलिस मिल गई उन्‍हें तो कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली का ठीकरा किसके सिर फोड़ेंगे। हालांकि वह भी अपने सारे व्‍यक्‍तिगत और सरकारी कार्यों के लिए मोदी जी को ही जिम्‍मेदार ठहराते हैं।
मेरे जैसे किसी सलाहकार की बात मानी होती केजरीवाल जी, तो जितेन्‍द्र तोमर की फर्जी डिग्री से लेकर सोमनाथ भारती तक पर दर्ज मामलों के लिए मोदी को जिम्‍मेदार ठहराया जा सकता था।
जितेन्‍द्र तोमर की डिग्री कहीं से बनी हो, है तो वह भारत का ही हिस्‍सा। और भारत के किसी कोने में कुछ हो, मोदी जी जिम्‍मेदार होंगे ही।
सोमनाथ भारती की बीबी अपने ही घर में सुरक्षित नहीं है, सोमनाथ उसे रोज पीटते थे। मोदी जी क्‍या कर रहे थे। दिल्‍ली पुलिस मोदी जी की, दिल्‍ली मोदी जी की…तो दिल्‍ली में रह रही अबला नारी की सुरक्षा का जिम्‍मा मोदी जी का नहीं था क्‍या।
मोदी जी को तभी इस्‍तीफा सौंप कर केजरीवाल की शरण में आ जाना चाहिए था जब पता लगा कि सोमनाथ अपनी बीबी लिपिका मित्रा को पीटा करते थे और उसने उनके खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज करा दिया है।
ऐसे में बहिन मायावती की भी बात को दरकिनार नहीं किया जा सकता। उनका सही कहना है कि दलितों की कुत्‍ते से तथाकथित तुलना करने पर अपने मंत्री को या तो तुरंत बर्खास्‍त करके जेल में डलवाएं या मान लें कि वो दलित विरोधी हैं।
जैसे आज तक बहिन जी ने उन्‍हें दलितों के हिमायती होने का तमगा दे रखा था।
बहिन जी! पूरा देश जानता है कि जिस तरह प्रदेश रहित इस देश के हर हिस्‍से में घटने वाली घटना के लिए सिर्फ और सिर्फ मोदी जी जिम्‍मेदार हैं, उसी तरह बिना किसी सीमा रेखा के देशभर के दलितों की आप इकलौती बहिन हैं। दलित कहीं का हो, लेकिन राखी बंधवाने वह आपके पास ही आता है।
आप अपने किसी भाई का अपमान कैसे सह सकती हैं, सहना भी नहीं चाहिए। मोदी जी के मंत्री की इतनी हिमाकत हुई कैसे…इसकी सीबीआई जांच लाजिमी है। और हां…जांच होती रहेगी लेकिन पहले मोदी जी वीके सिंह को बर्खास्‍त करके तिहाड़ भेजें।
मोदी जी ऐसा नहीं करते तो यह भी स्‍वत: सिद्ध हो जाता है कि वीके सिंह ने जो कुछ कहा, वह सब मोदी जी के इशारे पर कहा इसलिए अगली प्रेस कॉफ्रेंस में हम कुत्‍ते वाली बात के लिए मोदी जी को जिम्‍मेदार मानते हुए उनकी बर्खास्‍ती की मांग करेंगे और संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ से अपील करेंगे वह उन्‍हें जेल भेजे।
संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ पर याद आया कि बेचारे आजम खान जी भी देश में आपातकाल लागू करने की फरियाद राष्‍ट्रपति से कर चुके हैं। उन्‍हें पूरा देश ही खतरे में दिखाई दे रहा है।
मैंने सुना है कि जब से यूपी पुलिस ने उनकी चोरी हुई भैंसें बरामद करके दी हैं, तब से आजम खान उत्‍तर प्रदेश को संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ और चचा मुलायम सिंह को बान की मून समझने लगे हैं।
पता नहीं यह उनके दिमाग का कोई फितूर है या ओवैसी तथा जामा मस्‍जिद के शाही इमाम की बातों का असर कि वह अब संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ से नीचे बात ही नहीं करते।
मुलायम सिंह और अमर सिंह की मुलाकात पर आपत्‍ति जताते हुए भी उन्‍होंने यही कहा था कि वो इस मामले को संयुक्‍त राष्‍ट्र तक ले जायेंगे। देश का मुसलमान यहां सुरक्षित नहीं है। मोदी जी के इशारे पर मुलायम सिंह और अमर सिंह की मीटिंग फिक्‍स की जा रही है। नेताजी (मुलायम सिंह जी) को यादव सिंह मामले में सीबीआई का डर दिखाकर अमर सिंह के गले में हाथ डालने पर मजबूर कर रहे हैं देश के बादशाह मोदी जी। लेकिन मैं चुप होकर सहने वालों में से नहीं हूं। वह चाहें तो मेरी भैंस फिर खुलवा लें, चाहें तो ओवैसी और अमर को मेरे खिलाफ खड़ा कर दें लेकिन मैं किसी से डरने वाला नहीं। मैं देश के सबसे बड़े सूबे का सर्वाधिक प्रभावशाली मंत्री हूं। मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
जनाब आजम खां साहब सच कह रहे हैं। उनका कोई कुछ बिगाड़ सकता तो वह बेलगाम कैसे होते। इसके लिए भी मोदी जी जिम्‍मेदार हैं।
बहरहाल, मोदी जी का चाय से बहुत गहरा नाता है और इसलिए चाय के विज्ञापन में गरीब अल्‍पसंख्‍यकों का उड़ाया गया मजाक मुझे कतई बर्दाश्‍त नहीं हुआ लिहाजा मैं मोदी जी को उसके लिए तहेदिल से जिम्‍मेदार मानते हुए एक अदद केस दर्ज कराने जा रहा हूं।
आप के पास कोई ऐसा मामला मोदी जी के खिलाफ हो तो आप भी लग लीजिए मेरे साथ। पता नहीं आगे कभी ऐसा सुअवसर हाथ आया कि नहीं आया।
-यायावर

Friday, 28 August 2015

मथुरा की कानून-व्‍यवस्‍था भी ”समाजवादी”

यूं तो समूचे सूबे में कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली के उदाहरण हर रोज सामने आते हैं लेकिन यदि बात करें सिर्फ विश्‍व विख्‍यात धार्मिक जनपद मथुरा की तो ऐसा लगता है कि यहां कानून-व्‍यवस्‍था भी ”समाजवादी” हो गई है।
मसलन…जाकी रही भावना जैसी। जिसे अच्‍छी समझनी हो, वो अच्‍छी समझ ले और जिसे बदहाल समझनी हो, वो बदहाल समझ ले। इस मामले में अभिव्‍यक्‍ति की पूरी स्‍वतंत्रता है।
वैसे आम आदमी जो न समाजवादी है और न बहुजन समाजी है, न कांग्रेसी है और न भाजपायी है, न रालोद का वोटर है और न वामपंथी है…उसके अनुसार यहां कानून-व्‍यवस्‍था अब केवल एक ऐसा मुहावरा है जिसका इस्‍तेमाल अधिकारीगण अपनी सुविधा अनुसार करते रहते हैं।
कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली में तैनात होने वाले अधिकारियों को यह सुविधा स्‍वत: सुलभ हो जाती है क्‍योंकि यहां नेता और पत्रकार केवल दर्शनीय हुंडी की तरह हैं। अधिकांश नेता और पत्रकारों का मूल कर्म दलाली और मूल धर्म चापलूसी बन चुका है।
चोरी, डकैती, हत्‍या, लूट, बलात्‍कार, बलवा जैसे तमाम अपराध हर दिन होने के बावजूद मथुरा के नेता और पत्रकार अपने मूल कर्म व मूल धर्म को निभाना नहीं भूलते।
कहने को यहां सत्‍ताधारी समाजवादी पार्टी की एक जिला इकाई भी है और उसके पदाधिकारी भी हैं लेकिन उनका कानून-व्‍यवस्‍था से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं।
दरअसल वो कन्‍फ्यूज हैं कि कानून-व्‍यवस्‍था के मामले में किसकी परिभाषा को उचित मानकर चलें।
जैसे प्रदेश पुलिस के मुखिया कहते हैं कि कानून-व्‍यवस्‍था नि:संदेह संतोषजनक नहीं है। पार्टी के मुखिया का भी यही मत है। वो कहते हैं कि यदि आज की तारीख में चुनाव हो जाएं तो पार्टी निश्‍चित हार जायेगी। उनके लघु भ्राता प्रोफेसर रामगोपाल की मानें तो स्‍थिति इतनी बुरी भी नहीं है जितनी प्रचारित की जा रही है। जबकि ”लिखा-पढ़ी” में मुख्‍यमंत्री पद संभाले बैठे अखिलेश यादव का कहना है कि उत्‍तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था उत्‍तम है और यहां का पुलिस-प्रशासन बहुत अच्‍छा काम कर रहा है। दूसरे राज्‍यों से तो बहुत ही बेहतर परफॉरमेंस है उसकी।
ऐसे में किसकी परिभाषा को सही माना जाए और किसे गलत साबित किया जाए, यह एक बड़ी समस्‍या है।
मथुरा में एक पूर्व मंत्री के घर चोरी होती है तो कहा जाता है कि सुरक्षा बढ़वाने के लिए ऐसा प्रचार किया गया है। व्‍यापारी के यहां डकैती पड़ती है तो बता दिया जाता है कि पुराने परिचित ने डाली है। समय मिलने दो, पकड़ भी लेंगे। हाईवे पर वारदात होती है तो अगली वारदात का इंतजार इसलिए करना पड़ता है जिससे पता लग सके कि अपराधियों की कार्यप्रणाली है क्‍या। वो हरियाणा से आये थे या राजस्‍थान से। यह भी संभव है कि उनका राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र से सीधा कनैक्‍शन हो।
हां, इस बीच कुछ उचक्‍के टाइप के बदमाश पकड़ कर गुड वर्क कर लिया जाता है जिसे स्‍थानीय मीडिया पूरा कवरेज देकर साबित कर देता है कि मथुरा का पुलिस-प्रशासन निठल्‍ला चिंतन नहीं कर रहा। साथ में काम भी कर रहा है। एक्‍टिव है।
थोड़े ही दिन पहले की बात है जब मथुरा पुलिस की स्‍वाट टीम का बड़ा कारनामा जाहिर हुआ। बिना काम किए वैसा कारनामा कर पाना संभव था क्‍या।
स्‍वाट टीम के कारनामे ने साबित कर दिया कि वह दिन-रात काम कर रही है। यह बात अलग है कि वह काम किसके लिए और क्‍यों कर रही है। इस बात का जवाब देना न स्‍वाट टीम के लिए जरूरी है और न उनके लिए जिनके मातहत वह काम करती है। जांच चल रही है…नतीजा निकलेगा तो बता दिया जायेगा। नहीं निकला तो आगे देखा जायेगा।
आज यहां एसएसपी डॉ. राकेश सिंह हैं, इनसे पहले मंजिल सैनी थीं। उनसे भी पहले नितिन तिवारी थे। अधिकारी आते-जाते रहते हैं, कानून-व्‍यवस्‍था जस की तस रहती है। अधिकारी अस्‍थाई हैं, कानून-व्‍यवस्‍था स्‍थाई है।
मथुरा में हर अधिकारी सेवाभाव के साथ आता है। कृष्‍ण की पावन जन्‍मभूमि पर मिली तैनाती से वह धन्‍य हो जाता है। उसे समस्‍त ब्रजवासियों और ब्रजभूमि में आने वाले लोगों के अंदर कृष्‍णावतार दिखाई देने लगता है।
कृष्‍णावतार पर कानून का उपयोग करके वह इहिलोक और परलोक नहीं बिगाड़ना चाहता। बकौल मुलायम सिंह कृष्‍ण भी तो समाजवादी थे। यादव थे…इसका मतलब समाजवादी थे।
यहां कहा भी जाता है कि सभी भूमि गोपाल की। जब सब गोपाल का है तो गोपालाओं का क्‍या दोष। वह तो समाजवादी कानून के हिसाब से ही चलेंगे ना।
कृष्‍ण की भूमि पर तैनाती पाकर उसकी भक्‍ति में लीन अधिकारी इस सत्‍य से वाकिफ हो जाते हैं कि एक होता है कानून…और एक होता है समाजवादी कानून।
समाजवादी कानून सबको बराबरी का दर्जा देता है। लुटने वाले को भी और लूटने वाले को भी। पिटने वाले को भी और पीटने वाले को भी।
कागजी घोड़े सदा दौड़ते रहे हैं और सदा दौड़ते रहेंगे। बाकी अदालतें हैं न। वो भी तो देखेंगी कि कानून क्‍या है और व्‍यवस्‍था क्‍या है। कानून समाजवादी है और व्‍यवस्‍था मुलायमवादी है। चार लोग रेप नहीं कर सकते, इस सत्‍य से पर्दा हर कोई नहीं उठा सकता। पता नहीं ये गैंगरेप जैसा घिनौना शब्‍द किस मूर्ख ने ईजाद किया और किसने कानून का जामा पहना दिया।
उत्‍तर प्रदेश ऐसे कानून को स्‍वीकार नहीं करता। नेताजी को रेप स्‍वीकार है, रेपिस्‍ट स्‍वीकार हैं…गलती हो जाती है किंतु गैंगरेप स्‍वीकार नहीं क्‍योंकि वह गलती से भी नहीं किया जा सकता। संभव ही नहीं है।
ठीक उसी तरह जैसे कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली संभव नहीं है। वह कुछ गैर समाजवादी विरोधी दलों के दिमाग की उपज है। उनके द्वारा किया जाने वाला दुष्‍प्रचार है।
कानून-व्‍यवस्‍था कैसे बदहाल हो सकती है। वो बदहाल कर तो सकती है, खुद बदहाल हो नहीं सकती।
-लीजेंड न्‍यूज़

Wednesday, 19 August 2015

रंग रंगीली दुनिया, रंग रंगीले लोग

ये दुनिया जितनी रंग रंगीली है, उतने ही रंग रंगीले हैं लोग। लोगों को और रंगीन बनाती हैं उनकी आदतें। वो आदतें जिनसे हास्‍य उपजता है। ऐसा हास्‍य जो न समय देखता है, न स्‍थान। न मौका देखता है, न मौके की नज़ाकत। रंग रंगीली दुनिया के रंग रंगीले लोगों की आदतों से उपजी ऐसी ही कुछ विषम स्‍थिति-परिस्‍थितियों पर गौर फरमाइए।
दो दिन पहले मेरे एक पड़ोसी बदहवास सी हालत में आए। मैंने उनकी सूरत को देखते हुए पूछा- क्‍या हुआ, कुछ परेशान नजर आ रहे हैं।
कहने लगे- ”पता चली” मेरी बीबी 6 माह से प्रेगनेंट है। मैंने उत्‍सुकतावश पूछा- भाभीजी 6 माह से प्रेगनेंट हैं और आपको अब जाकर पता चला है।
इस पर उनका जवाब था- मजाक मत करो भाई… ”पता चली” उसे परेशानी हो रही है। कोई डॉक्‍टर बताओ।
दरअसल, ”पता चली” उनका तकिया कलाम है और वो हर वाक्‍य का आदि और अंत ”पता चली” के साथ करते हैं।
वो अगर अपने यहां पुत्र रत्‍न प्राप्‍त होने जैसा शुभ समाचार भी अपने श्रीमुख से देंगे तो विद् तकिया कलाम ही डिलीवर करेंगे। कहेंगे…”पता चली” मैं आज बेटे का बाप बन गया हूं।
यह परेशानी अकेले मेरे पड़ोसी की ही नहीं है। बहुतों के साथ होती है। राष्‍ट्रीय स्‍तर पर भी इसके एक-दो नहीं अनेक उदाहरण मिल जायेंगे।
आश्‍चर्य की बात यह है कि इस परेशानी के शिकार लोगों को इस बात का अहसास तक नहीं होता कि वह कई मौकों पर उसके कारण मजाक का पात्र बन जाते हैं।
हमारे देश की राष्‍ट्रीय पार्टी के एक राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेता हैं। उनका तकिया कलाम है ”भैया”।
वह हर एक वाक्‍य का प्रथम और अंतिम चरण ”भैया” से पूरा करते हैं।
उदाहरण के लिए कुछ ग्रामीणों के बीच कल ही वह बोल रहे थे- ”भैया” मैं प्रधानमंत्री से पूछना चाहता हूं कि ”भैया” वह देश को मूर्ख क्‍यों बना रहे हैं। ”भैया” आप तो जानते ही हैं ”भैया” कि एक दिन मेरी मम्‍मी ने मुझसे कहा कि ”भैया” ये राजनीति एक जहर के समान है ”भैया”।
मैं छोटा था तब अपने ”पिता” से पूछा करता था- ”भैया” आप राजनीति से इतने दिनों तक दूर क्‍यों रहे।
मैं अपनी मां से भी पूछता हूं कि ”भैया” आप मुझे मेरे हिसाब से राजनीति क्‍यों नहीं करने देतीं।
अपने जीजा से भी एक दिन कहा था कि ”भैया” अगर आप राजनीति में सक्रिय होना चाहते हैं तो आपका स्‍वागत है ”भैया”।
मेरी बहन कभी जब मुझे लेकर काफी चिंतित हो जाती है तो मैं उससे भी कहता हूं- ”भैया” परेशान होने की जरूरत नहीं है।
पप्‍पू कभी न कभी पास जरूर होता है ”भैया”, यह बात आप भी जानते हैं ”भैया”।
राजनीति के ही एक और युवा महारथी हैं। सॉफ्ट समाजवादी से उपजे इन महारथी का तकिया कलाम ”पाल्‍टी” है। वैसे वो वहां ‘पार्टी” बोलना चाहते हैं किंतु विरासत में मिली ”पाल्‍टी” को पाल्‍टी ही बोलते हैं और उसे ही उन्‍होंने तकिया कलाम बना लिया है।
चंद रोज पहले वह एक जगह मंच से बोल रहे थे- ”हमाई पाल्‍टी” ने जितना काम प्रदेश में किया है, उतना आजतक किसी ”पाल्‍टी” ने नहीं किया। ”हमाई पाल्‍टी” नीति, नैतिकता, सिद्धांत और कथनी व करनी की समानता के आधार पर चलती है। ”हमाई पाल्‍टी” को हमाई ही पाल्‍टी के कुछ कार्यकर्ता बदनाम कर रहे हैं। हमाई पाल्‍टी चाहती है कि वह थाने की राजनीति न करें और जमीन पर आएं।
आदत से मजबूर एक बार तो वह एक कार्यक्रम में अपने बच्‍चों की तरफ इशारा करते हुए बोल बैठे- ”हमाई इस पाल्‍टी” की नींव हमारे नेताजी ने रखी थी।
एक्‍चुअली वो अपने ”पिताजी” को ”नेताजी” कहकर ही संबोधित करते हैं। तकिया कलाम के चक्‍कर में वह बच्‍चों को ”पाल्‍टी” और पिताजी को ”पाल्‍टी की नींव” रखने वाला बता गए।
ऐसे लोगों के साथ एक समस्‍या यह और होती है कि उन्‍हें खुद समझ में नहीं आता कि उनका तकिया कलाम दूसरों के लिए मनोरंजन का साधन बन रहा है।
देश के ”सबसे तेज” न्‍यूज़ चैनल के एक न्‍यूज़ एंकर का तकिया कलाम है ”इस दौर में” और ”यूं कहें कि” ”दरअसल” आदि-आदि ।
नरेन्‍द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर जब अपने चैनल की ओर से रात्रिकालीन सेवा प्रस्‍तुत करने आए तो उचक-उचक कर कहने लगे- ”दरअसल” ”इस दौर में” में नरेंद्र मोदी को उम्‍मीद से कहीं अधिक सीटें हासिल हो गईं या ”यूं कहें कि” उन्‍हें स्‍पष्‍ट बहुमत मिल गया है। ”दरअसल” ”इस दौर में” वो प्रधानमंत्री पद की शपथ 26 मई को लेने जा रहे हैं या ”यूं कहें कि” वो 26 मई को शपथ लेंगे।
”दरअसल” यह एंकर महाशय खड़े होकर समाचार वाचन करते हैं और जितनी देर तक स्‍क्रीन पर अपनी उपस्‍थिती दर्ज कराते हैं, उतनी देर तक पंजों के बल उचकते रहते हैं।
”दरअसल” सही करते हैं वो क्‍योंकि मुझे भी ”इस दौर में” डर है कि बैठकर समाचार पढ़ने के बाद वह कैमरे की जद में आ भी पायेंगे या नहीं। या ”यूं कहें कि” दिखाई देंगे भी या नहीं।
कहने को वो राष्‍ट्रीय स्‍तर के अंतर्राष्‍ट्रीय पत्रकार हैं किंतु कभी-कभी समझ में नहीं आता कि उनके तकिया कलाम को हम क्‍या समझें क्‍योंकि हम जानते हैं समझना हमें ही होगा, वह ”इस दौर में” में समझने को तैयार नहीं हैं।
समझने को तो हम भी तैयार नहीं हैं और इसलिए उनकी बातों से ज्‍यादा ध्‍यान हम उनके तकिया कलाम पर देते हैं अन्‍यथा ”पता चली” ”भैया” हमें ”हमाई पाल्‍टी” के नेताजी जो इतना अच्‍छा काम कर रहे हैं, थोड़ा-बहुत ध्‍यान उन पर भी दिया होता।
”दरअसल” ”इस दौर में” हम इतने स्‍वार्थी हो गए हैं कि हमें अपने अलावा किसी और की अच्‍छाई नजर नहीं आती या ”यूं कहें कि” दिखाई नहीं देती।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

Monday, 17 August 2015

काश…पढ़-लिखकर मेरे बच्‍चे नेता बनें

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
मैं चाहता हूं कि मेरे बच्‍चे पढ़-लिखकर नेता बनें। वैसे हमारे देश में नेता बनने के लिए पढ़ाई-लिखाई मस्‍ट नहीं है लेकिन फिर भी मैं चाहता हूं कि मेरे बच्‍चे पढ़-लिखकर ही नेता बनें ताकि उन्‍हें संसद में बोलने या किसी बड़ी हस्‍ती की मौत पर शोक संदेश लिखने के लिए नकल की पर्ची साथ ले जाने की जरूरत न पड़े।
मुझे आज तक यह बात समझ में नहीं आई कि देश के अधिकांश मां-बाप अपने बच्‍चों को पढ़ा-लिखाकर डॉक्‍टर, इंजीनियर, ब्‍यूरोक्रेट आदि ही क्‍यों बनाना चाहते हैं जबकि नेतागीरी में बिना पढ़े-लिखे भी फ्यूचर जितना ब्राइट है, उतना किसी दूसरे क्षेत्र में नहीं है। पढ़-लिख लिए तो सोने पर सुहागा जैसी कहावत चरितार्थ होती है।
नेतागीरी में न सिर्फ अपना बल्‍कि अपनी कई पीढ़ियों का भविष्‍य सुरक्षित करने का कितना स्‍कोप है, इसके एक-दो नहीं अनगिनित उदाहरण आंखों के सामने हैं।
गुजरे जमाने के नेताओं की बात यदि ना की जाए तो आज का पप्‍पू नकल की पर्चियों से राजनीति में पास होने के लिए स्‍वतंत्र है। मजे की बात यह है कि सड़क से संसद तक नकल करते पकड़े जाने के बाद भी उसे ”बुक” नहीं किया जाता और तमाम लोग उसके पक्ष में सामने आकर खड़े हो जाते हैं।
यही एकमात्र ऐसा फील्‍ड है जहां हर माल बारह आने के हिसाब से बिकता है। इस फील्‍ड में गधे, घोड़े और खच्‍चर सब का मोल एक है। बारहवीं जमात ही पास करके कोई मानव संसाधन विकास मंत्री बन सकता है तो कोई हाईली एजुकेटेड होने या सेना का अवकाश प्राप्‍त जनरल होने पर भी राज्‍यमंत्री बनता है। बमुश्‍किल आठवीं जमात पास साध्‍वी महत्‍वपूर्ण विभाग का पदभार संभाल लेती हैं परंतु अच्‍छे-खासे पढ़-लिखकर आईएएस बनने वाले उनके अधीनस्‍थ हाथ बांधकर खड़े रहने पर मजबूर हैं।
तमाम नेता तो ऐसे हैं देश में जिन्‍हें डिग्रीधारी बनाकर उनकी यूनिवर्सिटी आज खुद को धन्‍य महसूस करती है। उसे मानना पड़ता है कि उनकी डिग्री में दम है।
कल स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से दिए गए भाषण को लेकर किसी सिरफिरे पत्रकार ने एक कायाकल्‍पी नेता से सरेआम पूछ डाला कि आज के भाषण पर आपकी क्‍या प्रतिक्रिया है?
कायाकल्‍पी नेता ने औपचारिक रूप से तो कैमरे के सामने कहा कि आज का दिन राजनीति के लिए नहीं है लिहाजा कल प्रतिक्रिया देंगे…लेकिन कैमरा ऑफ होते ही वह पत्रकार पर चढ़ बैठे।
कहने लगे कि यार तुम कतई बौड़म हो क्‍या, जानते नहीं कि अभी प्रतिक्रिया देने के लिए हमारे नोट्स तैयार नहीं हुए हैं, कल तक नोट्स तैयार हो जायेंगे तो हम खुद-ब-खुद प्रतिक्रिया देने चले आयेंगे। आज सब छुट्टी मना रहे हैं।
बहरहाल, बात हो रही थी नेतागीरी में स्‍कोप की। देश की दोनों बड़ी पार्टियों में राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष के पद को सुषोभित करने वालों की शैक्षिक योग्‍यता का इल्‍म ”गूगल बाबा” तक को नहीं है। आरटीआई जैसा हथियार भी इनकी शैक्षिक योग्‍यता के सामने हथियार डाल देता है। विश्‍वास न हो तो इस मुद्दे पर आरटीआई डालकर देख लो। कश्‍मीर से लेकर कन्‍याकुमारी तक कोई कुछ बता दे, तो राधे मां के चरण पकड़ लेना जाकर। उसके बाद मुक्‍ति के मार्ग केवल वही बता पायेंगी। आसाराम बेचारे निराश हैं अन्‍यथा वो भी बता सकते थे। तिहाड़ जाने का जुगाड़ कर सको तो वो आज भी बता देंगे। जेबरी भले ही जल गई हो किंतु बल ज्‍यों के त्‍यों हैं। बाबा रामपाल अपनी करनी का फल भुगत रहे हैं अन्‍यथा वो भी बड़े उद्धारक हैं।
सेबी ने बेचारे सहारा को बेसहारा कर दिया है और वो खुद सुप्रीम कोर्ट के सहारे अपने दिन काट रहे हैं वर्ना नेताओं की उनके पास भी कभी अच्‍छी काट हुआ करती थी। आज नेता उन्‍हें काट रहे हैं।
यानि ”सब पर भारी अटलबिहारी” जैसे नारे की तरह नेतागीरी सब पर भारी पड़ती है। आम के आम और गुठलियों के भी दाम। बुढ़ापे तक साथ देती है राजनीति। इसमें न कोई ”भूत” होता है और न ”पूर्व”। उम्र का आंकड़ा तो जैसे पानी भरता है नेताओं के सामने। ऐसा नहीं होता तो कब्र में पैर लटकाए बैठै नेताजी के दामन से इस आशय का दाग नहीं धुल पाता कि ”न नर हैं न नारी हैं, नारायण….तिवारी हैं”। मौके देती है नेतागीरी, भरपूर मौके। तभी तो कोई पूर्व मुख्‍यमंत्री अपनी बेटी की उम्र वाली टीवी एंकर से इश्‍क लड़ाता है और कोई महिला मंत्री अपने बेटे की उम्र के लड़के से आईस-पाईस का खेल खेलती है।
इतना सब-कुछ समझाने-बुझाने के बावजूद मुझे शक है कि मेरे बच्‍चे मेरी सलाह मानेंगे। उनके अपने (कु) तर्क हैं। वो कहते हैं नेतागीरी के अलावा भी इस देश में एक फील्‍ड और ऐसा है जहां पढ़ाई-लिखाई पानी भरती है।
उनके ज्ञान के सामने में तब नतमस्‍तक हो गया जब उन्‍होंने भारत रत्‍न से लेकर खेल रत्‍न तक और पद्म पुरस्‍कारों से लेकर द्रोणाचार्य पुरस्‍कार तक का हिसाब दे डाला। साथ ही मेरे सामने भी प्रश्‍न उछाल दिया कि इनमें से किसी की शैक्षिक योग्‍यता का आपको पता है।
और हां, इन्‍हें भी छोड़ दें तो बॉलीवुड भरा पड़ा है अंगूठा टेक लेकिन भरी जवानी में तमाम पुरस्‍कारों से नवाजे जा चुके अदाकारों से। वहां भी कीमत कागजी पढ़ाई की नहीं, जुबानी जमाखर्च की है। पर्ची का वहां भी उतना ही महत्‍व है जितना कि नेतागीरी में। पर्ची पर लिखकर मिले डायलॉग जो जितना अच्‍छा डिलीवर कर लेगा, उसका उतना ही महत्‍व बढ़ जायेगा।
कहते हैं कि पर्ची से नकल के लिए भी अकल की जरूरत होती है…लेकिन यहां तो उसमें भी लगातार फेल होने वाला पप्‍पू नेतागीरी में पास है। बार-बार पकड़ा जाता है और फिर भी लोग कहते हैं कि बूढ़ा तोता पता नहीं कहां से ऐसी कोई हरी मिर्च खाकर लौटा है कि उलटा नाम बांचकर भी बाल्‍मीकि की तरह ब्रह्मज्ञानी कहला रहा है।
राम-राम को मरा-मरा पढ़कर ज्ञान सिर्फ नेतागीरी में ही संभव है।
मैं इसीलिए यही चाहता हूं कि मेरे बच्‍चे पढ़-लिखकर नेतागीरी ही करें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी