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Monday, 17 August 2015

काश…पढ़-लिखकर मेरे बच्‍चे नेता बनें

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
मैं चाहता हूं कि मेरे बच्‍चे पढ़-लिखकर नेता बनें। वैसे हमारे देश में नेता बनने के लिए पढ़ाई-लिखाई मस्‍ट नहीं है लेकिन फिर भी मैं चाहता हूं कि मेरे बच्‍चे पढ़-लिखकर ही नेता बनें ताकि उन्‍हें संसद में बोलने या किसी बड़ी हस्‍ती की मौत पर शोक संदेश लिखने के लिए नकल की पर्ची साथ ले जाने की जरूरत न पड़े।
मुझे आज तक यह बात समझ में नहीं आई कि देश के अधिकांश मां-बाप अपने बच्‍चों को पढ़ा-लिखाकर डॉक्‍टर, इंजीनियर, ब्‍यूरोक्रेट आदि ही क्‍यों बनाना चाहते हैं जबकि नेतागीरी में बिना पढ़े-लिखे भी फ्यूचर जितना ब्राइट है, उतना किसी दूसरे क्षेत्र में नहीं है। पढ़-लिख लिए तो सोने पर सुहागा जैसी कहावत चरितार्थ होती है।
नेतागीरी में न सिर्फ अपना बल्‍कि अपनी कई पीढ़ियों का भविष्‍य सुरक्षित करने का कितना स्‍कोप है, इसके एक-दो नहीं अनगिनित उदाहरण आंखों के सामने हैं।
गुजरे जमाने के नेताओं की बात यदि ना की जाए तो आज का पप्‍पू नकल की पर्चियों से राजनीति में पास होने के लिए स्‍वतंत्र है। मजे की बात यह है कि सड़क से संसद तक नकल करते पकड़े जाने के बाद भी उसे ”बुक” नहीं किया जाता और तमाम लोग उसके पक्ष में सामने आकर खड़े हो जाते हैं।
यही एकमात्र ऐसा फील्‍ड है जहां हर माल बारह आने के हिसाब से बिकता है। इस फील्‍ड में गधे, घोड़े और खच्‍चर सब का मोल एक है। बारहवीं जमात ही पास करके कोई मानव संसाधन विकास मंत्री बन सकता है तो कोई हाईली एजुकेटेड होने या सेना का अवकाश प्राप्‍त जनरल होने पर भी राज्‍यमंत्री बनता है। बमुश्‍किल आठवीं जमात पास साध्‍वी महत्‍वपूर्ण विभाग का पदभार संभाल लेती हैं परंतु अच्‍छे-खासे पढ़-लिखकर आईएएस बनने वाले उनके अधीनस्‍थ हाथ बांधकर खड़े रहने पर मजबूर हैं।
तमाम नेता तो ऐसे हैं देश में जिन्‍हें डिग्रीधारी बनाकर उनकी यूनिवर्सिटी आज खुद को धन्‍य महसूस करती है। उसे मानना पड़ता है कि उनकी डिग्री में दम है।
कल स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से दिए गए भाषण को लेकर किसी सिरफिरे पत्रकार ने एक कायाकल्‍पी नेता से सरेआम पूछ डाला कि आज के भाषण पर आपकी क्‍या प्रतिक्रिया है?
कायाकल्‍पी नेता ने औपचारिक रूप से तो कैमरे के सामने कहा कि आज का दिन राजनीति के लिए नहीं है लिहाजा कल प्रतिक्रिया देंगे…लेकिन कैमरा ऑफ होते ही वह पत्रकार पर चढ़ बैठे।
कहने लगे कि यार तुम कतई बौड़म हो क्‍या, जानते नहीं कि अभी प्रतिक्रिया देने के लिए हमारे नोट्स तैयार नहीं हुए हैं, कल तक नोट्स तैयार हो जायेंगे तो हम खुद-ब-खुद प्रतिक्रिया देने चले आयेंगे। आज सब छुट्टी मना रहे हैं।
बहरहाल, बात हो रही थी नेतागीरी में स्‍कोप की। देश की दोनों बड़ी पार्टियों में राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष के पद को सुषोभित करने वालों की शैक्षिक योग्‍यता का इल्‍म ”गूगल बाबा” तक को नहीं है। आरटीआई जैसा हथियार भी इनकी शैक्षिक योग्‍यता के सामने हथियार डाल देता है। विश्‍वास न हो तो इस मुद्दे पर आरटीआई डालकर देख लो। कश्‍मीर से लेकर कन्‍याकुमारी तक कोई कुछ बता दे, तो राधे मां के चरण पकड़ लेना जाकर। उसके बाद मुक्‍ति के मार्ग केवल वही बता पायेंगी। आसाराम बेचारे निराश हैं अन्‍यथा वो भी बता सकते थे। तिहाड़ जाने का जुगाड़ कर सको तो वो आज भी बता देंगे। जेबरी भले ही जल गई हो किंतु बल ज्‍यों के त्‍यों हैं। बाबा रामपाल अपनी करनी का फल भुगत रहे हैं अन्‍यथा वो भी बड़े उद्धारक हैं।
सेबी ने बेचारे सहारा को बेसहारा कर दिया है और वो खुद सुप्रीम कोर्ट के सहारे अपने दिन काट रहे हैं वर्ना नेताओं की उनके पास भी कभी अच्‍छी काट हुआ करती थी। आज नेता उन्‍हें काट रहे हैं।
यानि ”सब पर भारी अटलबिहारी” जैसे नारे की तरह नेतागीरी सब पर भारी पड़ती है। आम के आम और गुठलियों के भी दाम। बुढ़ापे तक साथ देती है राजनीति। इसमें न कोई ”भूत” होता है और न ”पूर्व”। उम्र का आंकड़ा तो जैसे पानी भरता है नेताओं के सामने। ऐसा नहीं होता तो कब्र में पैर लटकाए बैठै नेताजी के दामन से इस आशय का दाग नहीं धुल पाता कि ”न नर हैं न नारी हैं, नारायण….तिवारी हैं”। मौके देती है नेतागीरी, भरपूर मौके। तभी तो कोई पूर्व मुख्‍यमंत्री अपनी बेटी की उम्र वाली टीवी एंकर से इश्‍क लड़ाता है और कोई महिला मंत्री अपने बेटे की उम्र के लड़के से आईस-पाईस का खेल खेलती है।
इतना सब-कुछ समझाने-बुझाने के बावजूद मुझे शक है कि मेरे बच्‍चे मेरी सलाह मानेंगे। उनके अपने (कु) तर्क हैं। वो कहते हैं नेतागीरी के अलावा भी इस देश में एक फील्‍ड और ऐसा है जहां पढ़ाई-लिखाई पानी भरती है।
उनके ज्ञान के सामने में तब नतमस्‍तक हो गया जब उन्‍होंने भारत रत्‍न से लेकर खेल रत्‍न तक और पद्म पुरस्‍कारों से लेकर द्रोणाचार्य पुरस्‍कार तक का हिसाब दे डाला। साथ ही मेरे सामने भी प्रश्‍न उछाल दिया कि इनमें से किसी की शैक्षिक योग्‍यता का आपको पता है।
और हां, इन्‍हें भी छोड़ दें तो बॉलीवुड भरा पड़ा है अंगूठा टेक लेकिन भरी जवानी में तमाम पुरस्‍कारों से नवाजे जा चुके अदाकारों से। वहां भी कीमत कागजी पढ़ाई की नहीं, जुबानी जमाखर्च की है। पर्ची का वहां भी उतना ही महत्‍व है जितना कि नेतागीरी में। पर्ची पर लिखकर मिले डायलॉग जो जितना अच्‍छा डिलीवर कर लेगा, उसका उतना ही महत्‍व बढ़ जायेगा।
कहते हैं कि पर्ची से नकल के लिए भी अकल की जरूरत होती है…लेकिन यहां तो उसमें भी लगातार फेल होने वाला पप्‍पू नेतागीरी में पास है। बार-बार पकड़ा जाता है और फिर भी लोग कहते हैं कि बूढ़ा तोता पता नहीं कहां से ऐसी कोई हरी मिर्च खाकर लौटा है कि उलटा नाम बांचकर भी बाल्‍मीकि की तरह ब्रह्मज्ञानी कहला रहा है।
राम-राम को मरा-मरा पढ़कर ज्ञान सिर्फ नेतागीरी में ही संभव है।
मैं इसीलिए यही चाहता हूं कि मेरे बच्‍चे पढ़-लिखकर नेतागीरी ही करें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

‘ऊपरवाला’ सिर्फ ‘ईश्‍वर’ का ही पर्यायवाची नहीं

 -सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
अगर आप इस गलतफहमी में जी रहे हैं कि ”ऊपरवाला” सिर्फ ”ईश्‍वर” का ही पर्यायवाची है, तो आप अपनी इस गलतफहमी को दूर कर लें। ”ऊपरवाले” के अब और भी मतलब है, और वही मतलब सार्थक हैं। वही अपनी महत्‍ता को साबित करते हैं।
उदाहरण के लिए भगवान कृष्‍ण का धाम कहलाने वाले हमारे मथुरा जिले में पिछले काफी समय से बिजली कुछ उसी तरह कभी-कभी चमकती है जैसे आकाशीय बिजली चमकती है। ये बात अलग है कि बिजली पूरी आये या ना आये बिल पूरा आता है।
बिजली की इस जालिम अदा के बारे में आप किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी से पूछ कर देख लीजिए, उसका एक ही टका सा जवाब होता है कि बिजली तो ”ऊपर” से ही नहीं है।
”ऊपरवाला” के शॉर्टकट ”ऊपर” को आप नहीं समझते तो यह आपकी बुद्धि के दिवालिएपन की निशानी है, इसमें बिजली विभाग के कर्मचारियों का कोई दोष नहीं है।
इस नए जमाने का ”ऊपरवाला” यूं तो लखनऊ में बैठता है किंतु वह यत्र-तत्र-सर्वत्र व्‍याप्‍त है। वह आकाश में भले ही न रहता हो किंतु आकाश मार्ग से कहीं भी पहुंच सकता है।
”ऊपरवाला” कहलाने के अब तक हासिल ‘ईश्‍वर’ के पेटेंट पर अब उसका एकाधिकार न सही, लेकिन सर्वाधिकार तो है ही।
यही कारण है कि जब-जब बिजली जाती है, तमाम तुच्‍छ प्राणी इस ऊपरवाले की ओर निहारने लगते हैं।
ऊपरवाले का तमगा प्राप्‍त कृष्‍ण अगर यदुवंशी थे तो लखनऊ में बैठा यह ऊपरवाला भी खुद को यदुवंशी कहता है। डीएनए मिलता है या नहीं, इसका जवाब तो मोदी जी और नीतीश कुमार ही दे सकते हैं क्‍योंकि दोनों को डीएनए की खोज में महारथ हासिल है।
बहरहाल, यदुवंशी कृष्‍ण की नगरी मथुरा के वाशिंदों को नए जमाने का ऊपरवाला तबियत से बिजली के झटके दे रहा है। उनकी नींद हराम कर रखी है। रोज रात को नौ साढ़े नौ बजे ऊपर वाला मथुरा की बत्‍ती गुल करता है और फिर मध्‍यरात्रि में एक बजे मेहरबान होता है।
पूछने पर कहता है कि तुम्‍हारा यदुवंशी रात 12 बजे पैदा हुआ था। उसका हैप्‍पी बर्थडे आने वाला है। मैं तो तुम्‍हें जागने की प्रेक्‍टिस करा रहा हूं। अब दिन ही कितने बचे हैं।
चैन से सोना है तो जागने की रिहर्सल जरूरी है। वो ऊपरवाला तुम्‍हारा ध्‍यान रखता है तो मैं तुम्‍हें कैसे भूल सकता हूं।
नए जमाने के ऊपर वाले का संदेश भी साफ है। सैफई से तीन पीढ़ियां प्रकट होने के बावजूद मथुरावासियों ने आज तक उन्‍हें दिया क्‍या। हर चुनाव में झुनझुना पकड़ाया और उम्‍मीद करते हैं कि चौबीसों घंटे बिजली मिल जायेगी।
यह बात अलग है कि नए जमाने के ऊपरवाले का नाम बदनाम न हो इसलिए उसने नीचे वाले अफसरों को समझा रखा है कि मैं सभी में व्‍याप्‍त हूं लिहाजा नाम बदल-बदल कर मेरा उपयोग किया करो।
मसलन कभी कहो कि बिजली ऊपर से नहीं है तो कभी कहो कि अनपरा से नहीं है। कभी बताओ कि मुरादाबाद से समस्‍या है तो कभी बताओ कि आगरा की पीली पोखर बिजली पी गई है।
इतने से भी मन भर जाए तो कान्‍हा के गोकुल और वृंदावन का नाम ले दो, बता दो कि समस्‍या वहां हैं। समस्‍या से निजात पानी है तो पापी मन, प्रभु को पहचान।
पहचान कि 2017 की विकट समस्‍या है। मथुरा की राशि में मोदी, मुलायम और मायावती विद्यमान होंगे। लग्‍न में मोदी मित्रभाव से बैठा है तो आठवें घर में मुलायम शत्रुभाव से। मायावती की न मोदी से बनती है और न मुलायम से इसलिए वह मथुरा के प्रति सदा तटस्‍थभाव से बैठी रहती हैं। दिनों के फेर उसकी माला के मनके में होते ही नहीं। उसकी माला में तो हर मनका समय और माया के हेर-फेर से आगे बढ़ता है। वर्ना सुमरनी पर आकर अटक जाता है।
खैर…बिजली का करंट बिजली आने से कहीं अधिक न आने पर झटका देता है, इसका इल्‍म ब्रजवासियों को भलीभांति हो चुका होगा। सूखे शंख कैसे बजते हैं, इसका पता तब लगता है जब बिना बिजली के बिजली का भारी-भरकम बिल सामने आता है।
और हां, क्‍या मजाल किसी की कि कोई बिल देने में आनाकानी कर जाए। ऊपरवाले की कृपा से नीचे वालों के हाथ बहुत लंबे हैं। बिजली आये न आये, बिल आयेगा और जमा भी करना होगा।
नहीं किया तो डंडा बजाने से लेकर डंडाडोली करके उठा ले जाने तक का बंदोबस्‍त ऊपरवाले ने कर रखा है। उसके कारिंदे सब जानते हैं कि सीधी उंगली से घी न निकले तो उंगली टेढ़ी कर लेनी चाहिए।
छप्‍पर फाड़कर गर्मी दे रहा है वो ऊपरवाला…तो दिल खोलकर बिल भेज रहा है ये ऊपरवाला। कंपटीशन जारी है बिना बिजली के।
चार घंटे की रात्रिकालीन एकमुश्‍त बिजली कटौती सिर्फ इसलिए है जिससे जान सको कि करनी का फल हर हाल में भोगना पड़ता है। एक विधायक नहीं… सांसद नहीं… यहां तक कि नगरपालिका भी नहीं…तो बिजली भी नहीं। बिन बिजली सब सून कहीं नहीं लिखा। बिन पानी सब सून जरूर लिखा है।
पानी की कोई शिकायत नहीं है, सबकी आंखों में पानी है। बिजली ने रुला जो रखा है। सरकार की बात मत करना। सरकार की आंखों का पानी सूख गया है। वैसे भी उसका काम रोना नहीं, रुलाना है।
और हां…2017 तक रुलाने का अधिकार तो हम-आप सभी ने दिया है उसे। फिर रोइए…रोते रहिए..और रात एक बजे तक का इंतजाम करके रखिए।
कुछ न मिले तो छत पर खड़े होकर आवाज लगाइए- जागते रहो…जागते रहो…क्‍योंकि सरकार और उसके नुमाइंदे ऐसी में सो रहे हैं।
नए जमाने के ऊपर वाले गहरी निद्रा में लीन हैं। पुराने जमाने का ऊपर वाला बांसुरी बजाने में तल्‍लीन हैं।
तुम किस खेत की मूली हो, खुद तय कर लो। मुझे तो पता नहीं।
खुदा जाने या खुद जानो।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

नींद रातभर क्‍यों मुझे नहीं आती ?

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
नींद रातभर क्‍यों मुझे नहीं आती? मेरे जैसे तुच्‍छ आदमी के लिए यह एक यक्ष प्रश्‍न है क्‍योंकि बचपन से सुना करता था कि ऐसी बीमारियों पर बड़े लोगों का आधिपत्‍य है। ग्‍लोबल भाषा में कहें तो धनकुबेरों ने इस बीमारी का पेटेंट अपने नाम करा रखा है लिहाजा किसी से इसका जिक्र करना तक मुनासिब नहीं समझता। कहीं कोई मुझे बड़ा आदमी न समझ बैठे।
समस्‍या का समाधान खुद निकालने की गरज से जब नींद न आने की वजह तलाशने लगा तो पता लगा कि समस्‍या की जड़ में इन दिनों चल रही वो सियासत है जिसकी तुलना गुंडे किस्‍म के सड़कछाप आवारा छोकरों की उस शब्‍दावली से की जा सकती है जिसे तथाकथित सभ्रांत लोग गालियां कहते हैं।
एक कहावत है जो गाहे-बगाहे हिंदी प्रेमियों के मुंह से सुनी जाती है। कहावत कुछ यूं है कि ”अंग्रेज चले गए और औलाद छोड़ गए”। कहावत का मर्म आप भी समझ गये होंगे।
खैर, अब न राजे-रजवाड़े रहे और न उनकी शानो-शौकत। न रियासत रहीं, न विरासत। जो रह गई है वह है सियासत…और वो भी उस दर्जे की जिसका जिक्र मैं ऊपर कर ही चुका हूं।
रात को किसी न किसी टीवी न्‍यूज़ चैनल पर उस कार्यक्रम को देखकर बिस्‍तर पकड़ता हूं जिसे आम आदमी पैनल डिस्‍कशन कहता है। न्‍यूज़ चैनल वाले पहले रात 11 बजे बाद ही डरावने कार्यक्रम दिखाते थे लेकिन अब 9 बजे से ही शुरू हो जाते हैं। मेरी नींद उड़ने का यही कारण है।
जैसे-तैसे सोने की कोशिश करता हूं तो कोई न कोई सियासती बाजीगर आंखों में उतर आता है।
मजमे के बीच वह बोलता है- साहिबान…अब मैं आपको ऐसे-ऐसे खेल दिखाऊंगा कि आप दांतों तले उंगली दबाकर रह जायेंगे।
हां, तो जमूरे… सबसे पहले साहब लोगों को पलटी मारकर दिखा। दिखा कि एक पार्टी से दूसरी पार्टी तक कैसे पलक झपकते ही पहुंचा जा सकता है।
साहब लोग समझते हैं कि देश में कई पार्टियां हैं और कई नेता। सच तो यह है कि ढेर सारी पार्टियां और ढेर सारे नेता, एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं।
कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, लोजपा, तेदेपा, आप और बाप सरीखी जितनी भी पार्टियां दिखाई देती हैं, वह सब एक प्राण कई देह हैं। यानी सबका रूप भले ही अलग-अलग है किंतु रूपक एक ही है। सूरतें जुदा हैं, सीरतें एक हैं।
जमूरे वोट डालने मात्र का अधिकार प्राप्‍त इन साहिबान को बता कि सत्‍ता किसी को प्राप्‍त हो, सिंहासन पर कोई बैठे लेकिन शासन में हिस्‍सेदारी सबकी रहती है।
जमूरे…साहब लोगों को ये भी बता कि पापी पेट की खातिर इन्‍हें क्‍या-क्‍या नहीं करना पड़ता।
ये सत्‍ता पक्ष और विपक्ष का नाटक खेलते हैं। संसद में कभी शीतकालीन सत्र खेलते हैं तो कभी वर्षाकालीन। कभी-कभी तो संसद से सड़क तक खेलते हैं।
व्‍यापमं की तरह ये हर जगह व्‍याप्‍त हैं। ललित मोदी की तरह इनकी ललित कलाओं का फैलाव भारत से लंदन तक विस्‍तार लिए हुए है। इनके लिए सुषमा, वसुंधरा, जैटली से लेकर वाड्रा, प्रियंका व चिदंबरम तक सब समान हैं। ये जब चाहें और जिसे चाहें मोहरा बनाकर अपना खेल शुरू कर देते हैं। जनता की कमाई पर इनका संपूर्ण एकाधिकार है, सर्वथा हकदार हैं ये उसके। इसीलिए तो ये कभी सरकार के नाम से पुकारे जाते हैं तो कभी विपक्ष के नाम से किंतु हकीकत यह है कि सत्‍तापक्ष भी ये हैं और विपक्ष भी ये ही हैं।
ये जब तक चाहते हैं संसद चलने देते हैं और जब मन नहीं होता तब उसी को खेल का मैदान बना लेते हैं।
जमूरे… साहिबान और कद्रदानों को यह भी जानकारी दे कि उन्‍हें जो कुछ होता दिखाई देता है, वह उसका भ्रम मात्र है। एक्‍चुअली जो ये सब मिलकर करते हैं, वह तो दिखाई ही नहीं देता। समझदार थे अंग्रेज जो मीटिंग, ईटिंग और चीटिंग की पर्याप्‍त व्‍यवस्‍था कर गए।
आज पूरा देश इन्‍हीं तीन कार्यों में व्‍यस्‍त है। जो इनमें से किसी एक काम को भी नहीं कर रहा, उसे अरविंद केजरीवाल ठुल्‍ला नहीं मानते। केजरीवाल ने दिल्‍ली का मुख्‍यमंत्री बनने के बाद दिल्‍ली और देश को बेशक कुछ और न दिया हो किंतु जिस तरह कपिल शर्मा ने अपने कॉमेडी शो से बाबाजी का ठुल्‍लू दिया, उसी तरह अरविंद केजरीवाल ने अपनी कॉमेडी सरकार से ‘ठुल्‍ला’ निकाल कर दिया है।
जहां तक सवाल राहुल गांधी का है तो जमूरे…साहिबानों को बता कि कुछ लोग जैसे कभी कुछ करने को पैदा नहीं होते, उसी तरह राहुल गांधी कभी बड़े होने को पैदा नहीं हुए। वह राहुल बाबा थे और राहुल बाबा ही रहेंगे।
कल की तो बात है जब सलमान खान की टिप्‍पणी पर उनके पिता सलीम खान को कहने पड़ा कि वह नासमझ है…प्‍लीज! उसकी बातों पर गौर न करें। राहुल और सलमान में एक बड़ी समानता है, दोनों ही अब तक पालने में झूल रहे हैं। उम्र का अर्धशतक लगा चुके लेकिन मिल्‍क चॉकलेट है कि मुंह से छूटती ही नहीं।
जमूरे…लोगों की प्रॉब्‍लम यह है कि वह नेता और अभिनेताओं के दीवानगी की हद तक मुरीद होते हैं। मीडिया की प्रॉब्‍लम यह है कि वह जो कुछ प्रसारित व प्रकाशित करता है, सब जनहित में करता है। कॉन्‍डोम के विज्ञापन से लेकर डीयो तक के विज्ञापन में जनहित निहित है।
गंडे, ताबीज तथा लॉकेट से लेकर तेल, साबुन और क्रीम तक…सबके विज्ञापन मीडिया जनहित में ही तो जारी करता है।
ठीक इसी प्रकार हर दिन किसी न किसी मुद्दे पर पैनल डिस्‍कशन कराना सबसे बड़ा पुण्‍यकार्य है। इससे जनता का ध्‍यान इधर-उधर नहीं भटकता। वो अपने नेताओं पर फोकस किये रहती है।
वो चैनल ही क्‍या, जो ब्रेन वॉश न कर सके। मोदी जी का एक महत्‍वपूर्ण मिशन है क्‍लीन इंडिया। न्‍यूज़ चैनल यही कर रहे हैं। पूरी तरह ब्रेन वॉश कर देते हैं।
यूं भी कहा जाता है कि गंदगी भी दिमाग की उपज है। यदि दिमाग खाली रहेगा तो कहीं गंदगी नजर नहीं आयेगी।
मेरा भी दिमाग न्‍यूज़ चैनल्‍स ने पूरी तरह खाली कर दिया है। ब्रेन वॉश कर दिया है।
पुरानी कहावत है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है। उधर मैंने न्‍यूज़ चैनल पर पैनल डिस्‍कशन देखा और इधर दिमाग देश दुनिया से पूरी तरह खाली हो जाता है। रह जाते हैं तो शैतान रूपी वह नेता, जो मेरी नींद के दुश्‍मन हैं।
अगर आप भी नींद न आने की बीमारी से पीड़ित हैं तो किसी वैद्य, हकीम, डॉक्‍टर या झोलाछाप के पास जाने से पहले एकबार खुद अपने मर्ज पर गौर करें। कहीं आपकी नींद भी मेरी तरह इन नेताओं ने तो नहीं छीन ली।
आमीन…आमीन…आमीन!
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी