Monday, 27 July 2026

मियां नसीरुद्दीन! इतना भी न उबलिए कि कब्र तक नसीब न हो, और जाते-जाते काफ़िर साबित हो जाएं


 
पाकिस्तान के कराची, सिंध के वाश‍िंंदे और अब कनाडा न‍िवासी  एक मशहूर शायर सलमान हैदर की एक कविता ‘मैं भी काफ़िर, तू भी काफ़िर’ इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। यूं तो यह कविता बहुत लंबी है लेकिन इसकी कुछ लाइनें इस प्रकार हैं- 

सुर भी काफ़िर, ताल भी काफ़िर, भांगड़ा, नाच, धमाल भी काफ़िर । 
वारिस शाह की हीर भी काफ़िर, चाहत की जंजीर भी काफ़िर ।। 
हंसना-रोना कुफ्र का सौदा, कला और कलाकार भी काफ़िर । 
जो मेरी धमकी न छापे, वह सारे अखबार भी काफ़िर ।।
मंदिर में तो बुत होता है, मस्जिद का भी हाल बुरा है ।
कुछ मस्जिद के बाहर काफ़िर, कुछ मस्जिद के अंदर काफ़िर ।। 


सलमान हैदर की इस कविता को गौर से पढ़ेंगे तो पता लगेगा कि आप तो पैदायशी काफ़िर हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं मानते। 
बहरहाल, इस समय मुद्दा कुछ और है इसलिए बात उस पर कर ली जाए। 
बात कुछ ऐसी है कि हाल ही में आपने कॉकरोचों के आंदोलन की आड़ लेकर अपनी बुरी सी शक्ल में एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है। 
इस वीडियो में आप कह रहे हैं कि ''अगर एक जाहिल इस मुल्क की रहनुमाई करे, तो उसका दिल यही चाहेगा कि पूरा मुल्क उसी की तरह जाहिल, नासमझ, नाकाबिल और बेरहम बने। इस वक्त मेरा दिल भी भरा हुआ है और मैं गुस्से से खौल गया हूं ये देखकर कि हमारे बच्‍चों के साथ किस तरह जुल्म का बर्ताव किया जा रहा है गुंडों के हाथों। कभी ये भी सोचा करो कि तुम्‍हारा अंजाम तुम्हें भी एक दिन मिलेगा जरूर। इस मुल्क की हुकूमत को मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि सब याद रखा जाएगा...'' 

ठहरिए मियां, अपनी उम्र और हालात पर तरस खाइए। इतना मत उबलिए कि जलकर ख़ाक हो जाएं क्योंकि आपका धर्म आपको ख़ाक हो जाने की इजाजत नहीं देता। आपको तो कब्र में लेटाया जाएगा। और यदि आप इसी तरह गुस्से से उबल-उबल कर किसी दिन मिट्टी में मिल गए तो आप जाते-जाते काफ़िर साबित हो जाएंगे। जो शायद न आपके लिए ठीक होगा, और न आपकी कौम के लिए। 
कौम से मतलब किसी धर्म विशेष से नहीं है, उस जमात से है जिसे निजी स्वार्थों की पूर्ति में बाधक बनने वाला हर व्यक्ति ज़ालिम और जाहिल नजर आता है और वो उसके विरोध में इतनी उतावली तथा अंधी हो जाती है कि देश के साथ गद्दारी पर उतर आती है। 
खैर, चिंता इस बात की है कि अगर आप ख़ाक हो गए तो जन्नत की बजाय जहन्नुम नसीब होगा। ऐसे में आपकी अपनी कौम के प्रति ये वफादारी किसी काम नहीं आएगी। कब्र में पैर लटकाए बैठे हो इसलिए फिर कोई ऐसा वीडियो अपलोड करने से पहले सोचें जरूर। 
और आपके मुताबिक जहां तक सवाल एक जाहिल द्वारा मुल्क की रहनुमाई करने का है तो मुझे लगता है कि सबसे बड़े जाहिल आप खुद हैं, क्योंकि आप जाहिल की परिभाषा ही नहीं जानते। यदि आप कागज के टुकड़ों यानी किसी डिग्री से किसी की योग्यता का आंकलन करते हैं तो तय है कि आप बुद्धि से कतई पैदल हैं। 
रहीम और रसखान से लेकर ताजबीबी तथा सूर, कबीर एवं तुलसी दास से लेकर कुंभन दास तक पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। मियां जरा बताइए तो कि ये विभूतियां किस कॉलेज, यूनिवर्सिटी, गुरुकुल या विश्वविद्यालय में पढ़ी थीं। 
इन्हें भी छोड़ दीजिए। यह बताइए कि जिस अकबर को आप महान बताते-बताते थकते नहीं हैं, वो कितना शिक्षित था। वो तो अंगूठा छाप था, और बमुश्‍किल अपने नाम का पहला अक्षर लिखना सीख पाया था। जाहिर है मियां, कि एजुकेशन और क्वालिफिकेशन दोनों अलग-अलग हैं। कागज के टुकड़ों पर मिली डिग्री किसी को पढ़ा-लिखा तो साबित कर सकती है लेकिन शिक्षित नहीं। जैसे आप पढ़े-लिखे चाहे जितने हों लेकिन माफ कीजिए, शिक्षित नहीं हैं। 
इस तरह देखा जाए तो सही मायनों में जाहिल आप और आपके वो 'कथित बच्चे हैं' जिनके लिए आप गुस्‍से से उबल रहे हैं और जो अपने बाप-दादा की उम्र के उस व्यक्‍ति को कैमरे के सामने मां-बहन की गालियां दे रहे हैं जो आपके दुर्भाग्य तथा करोड़ों लोगों के सौभाग्य से फिलहाल तो देश की रहनुमाई कर ही रहा है। 
उम्मीद है कि आगे भी करता रहेगा इसलिए सब याद रखने की जो धमकी आप उसे दे रहे हैं, जो सपने आप उसके अंजाम को लेकर देख रहे हैं, वो आपको दोजख मिलने तक पूरे नहीं होने के। 
वैसे मियां नसरु, एक बात तो बताइए कि क्या बीए पास कोई आदमी सर्जन बन सकता है। मतलब कि क्या वो सर्जरी कर सकता है, नहीं न! 
तो आपके हिसाब से देश के जितने नेता और उनके राजनीतिक वारिस बने बैठे हैं, वो सब भी जाहिल हुए क्योंकि उनकी पढ़ाई-लिखाई चाहे जिस विषय में हुई हो, राजनीति शास्त्र में तो नहीं हुई। ऐसे उत्तराधिकारियों की लिस्ट इतनी लंबी है कि गिनाने बैठे तो बहुत समय जाया हो जाएगा। 
और हां, आपने अपने इस वीडियो में यह भी बताया है कि आप राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) तथा पूना फिल्म इंस्‍टीट्यूट से अभिनय सीखकर आए थे। आपकी कुछ फिल्में मैंने भी देखी हैं। लगता था कि आप अच्छे अभिनेता हैं। लेकिन अब मेरी यह धारणा बदल गई है। आपके इस ताजा वीडियो को देखकर तो लगता है कि दो-दो प्रतिष्‍ठित संस्थाओं से पढ़कर आने के बावजूद आप जाहिल के जाहिल ही रहे। आपने लिखा-पढ़ी में यहां से सर्टिफिकेट तो ले लिए लेकिन अभिनय नहीं सीख पाए। अभिनय से आपका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। अभिनय सीखे होते और काबिल अभिनेता होते तो इस तरह अपने गुस्से को इजहार न करते। आपकी तो अभिनय की पूरी पढ़ाई मिट्टी में मिल गई क्योंकि आपने देश तथा देश के प्रधानमंत्री को लेकर अपने मन में पाल रखी घृणा को सार्वजनिक कर दिया। ठीक उन कॉकरोचों की तरह जो जंतर-मंतर पर इकठ्ठा हुए थे, और जिनके लिए आप उबल रहे हैं। उम्र का लिहाज कीजिए। खून में इतना उबाल किसी लिहाज से आपके लिए ठीक नहीं है। वैसे आपसे ये उम्मीद तो नहीं है कि इतनी गूढ़ बातें आपके पल्ले पड़ेंगी, फिर भी कह दी हैं ताकि सनद रहें और वक्त जरूरत काम आएं। आमीन! 

Saturday, 13 July 2024

हरि अनंत हरि कथा अनंता: मान गए गुज्जू भाई आपको, जूता भी उनका... चांद भी उनकी... वो भी सरेआम


 मान गए गुज्जू भाई आपको! वाकई कमाल की खोपड़ी पाई है ऊपर वाले से आपने। कल तक जो पानी-पी पीकर भरी सभाओं में आपको कोसा करते थे, वही आज पूरे टब्बर के साथ शिरकत करने जा पहुंचे। यहां तक कि जो बुढ़ऊ कोर्ट से कहते रहते हैं कि माई-बाप, तमाम बीमारियों ने घेर रखा है। हाथ-पैर काम नहीं करते। शरीर से लाचार हूं। व्‍हीलचेयर के सहारे जिंदगी सरक रही है, वह भी दोनों पैरों पर सरपट चलते दिखाई दिए। 

राजनीतिक कुनबे के दूसरे सदस्यों का हाल कुछ अलग नहीं रहा। कोई दरवाजे पर दांत निपोरते नजर आया तो कोई लाइन में लगा हुआ था। मीडिया से मुंह छिपाना आसान न रहा तो नजर चुराते हुए किसी ने कहा, हम तो आशीर्वाद देने आए हैं। कोई बोला, निमंत्रण था... बहुत इसरार किया इसलिए आना पड़ा। 
पिता-पुत्र की एक जोड़ी तो दरवाजे पर खड़ी होकर ऐसे दांत निपोर रही थी जैसे ढोल-नगाड़े वाले न्‍योछावर पाने की फिराक में निपोरते हैं। शेर की खाल वाले ये गीदड़ कतई नमूने नजर आ रहे थे, लेकिन उन्‍हें इस बात का रत्तीभर घमंड नहीं था।   
खप्पर हाथ में लेकर हर वक्त खून की प्यासी सी रहने वाली एक नेत्री भी जा पहुंचीं। दुश्मन दल के 'दोस्त' की मेहमान नवाजी ही कुछ ऐसी थी कि खुद के पहुंचने के बहाने भी खुद ही गढ़ लिए। 
बिना टोपी के जिन्हें रात में नींद नहीं आती, उनकी टोपी नदारद नजर आई। अलबत्ता बाकी लिबास वही था, जो उनकी पहचान बन गया है। बीबी-बच्चे बेशक आयोजन की नजाकत समझ रहे थे इसीलिए मौके और दस्तूर के मुताबिक सज-संवर कर आए लेकिन भैया ने समारोह को भी सम्मेलन समझ लिया। शायद ये डर भी रहा होगा कि पार्टी के ड्रेस कोड से इतर कुछ पहन-ओढ़ लिया तो कहीं लोग पहचानने से ही इंकार न कर दें। कल को इतने भव्य आयोजन में गैर हाजिरी लग गई तो लोग पूछने लगेंगे कि भैया कहां रास्‍ता भटक गए। भाभी-बच्‍चे तो चहकते दिखाई दिए लेकिन आपका वो सिर, सिरे से गायब क्यों रहा जिस पर दिन-रात खास रंग की टोपी सुशोभित होती रहती है। 
हाल ही में जीवन के 54 बसंत देख चुके चिर युवा नेता जी तो गुज्जू भैया की शान में इतने कसीदे पढ़ चुके हैं कि निमंत्रण मिलने पर उनकी स्‍थिति दयनीय सी हो गई। उनके और उनकी अम्मा के गले में अटक गया ये न्योता। समझ में ही नहीं आया कि उसे निगलें कि उगलें। आखिर एक उपाय सूझा कि फिलहाल पतली गली से विदेश यात्रा पर निकल लो। बाद की बाद में देखा जाएगा। अम्मा का क्या है, बुढ़िया भी है और बीमार भी। कोई न कोई बहाना बना ही देगी। रिटर्न गिफ्ट नहीं मिल सकेगा तो न सही। वैसे संभव है कि सोने-चांदी के वर्क लगे लड्डुओं का डिब्बा, मय रिटर्न गिफ्ट घर पर ही आ जाए। यूं तो अभी दो आयोजन और बाकी हैं, क्या पता अम्मा देर-सवेर हाजिरी लगा ही दे। 
जनता का क्या है, अगले इलेक्शन तक सब भूल जाती है। फिर हमारी जात की बेशर्मी का कोई तोड़ है क्या किसी के पास। शैतान भी हमारे सामने पानी मांग जाता है। गुज्जू भाइयों को गरियाने का कोई नया बहाना तब तक ढूंढ लेंगे। और इस बात का भी कि हम देश को लूटने वाले कारोबारियों के यहां क्यों गए थे। कह देंगे कि हम तो अपनी हिस्‍सेदारी तय करने गए थे। जिसकी जितनी संख्‍या भारी... उतनी उसकी हिस्‍सेदारी। हर बार 99 के फेर में थोड़े ही फंसना है। किनारे से लग गए हैं तो कभी लहर भी आ ही जाएगी। हां, अफसोस इस बात का जरूर रहेगा कि शादी-ब्‍याह रचाया होता, बाल-बच्‍चे खेल-कूद रहे होते तो हर बात के लिए अम्मा का मुंह न ताकना पड़ता। बिना पूछे भी जाना हो सकता था। मीडिया वालों से मुंह छिपाकर निकलने में तो महारत हासिल है। जैसे बाकी बातों के लिए टरका देते हैं, वैसे ही इस मामले में भी टरका देते। वैसे हैं अब भी बड़ी उलझन में, इसलिए विदेश यात्रा बीच में छोड़कर आशीर्वाद देने जा पहुंचें तो कोई आश्‍चर्य नहीं। 
अधेड़ उम्र वाले युवराज की सिपहसालारी करने वाले एक पूर्व मंत्री अपनी ओवरवेट बेगम के जा पहुंचे तो वायरल वीडियो के लिए कुख्‍यात कानूनविद ने भी मौका हाथ से नहीं निकलने दिया।  
बहरहाल, अब सुनिए मुद्दे की बात। और मुद्दे की बात यह है कि गुज्जू भाइयों ने इस मौके पर सबकी लंका लगाने का प्लान लोकतंत्र के महापर्व की मझधार में ही बना लिया था। उन्होंने कानाफूसी करके उसी दौरान तय कर लिया था कि न्‍योते को लालायित इन सारे चिल्‍लरों को सपरिवार आमंत्रित करना है। गुज्‍जू भाइयों को अपनी अक्ल और इनकी बेअक्ली पर पूरा भरोसा था। उन्‍हें पता था कि न्‍योता मिलते ही ये सब लार टपकाते आ पहुंचेंगे क्योंकि बुनियादी रूप से तो सबकी जात एक ही है और इसी लिए एक ही हमाम में बैठे हैं। 
गुज्जू भाइयों को बखूबी पता था कि इनका थूका हुआ इन्‍हीं की जीभ से चटवाने का इससे बेहतर अवसर दूसरा नहीं मिलेगा। चूंकि इन्‍होंने थूका भी था भरी सभाओं में तो चाटने के लिए भी इससे अच्‍छा मंच कौन सा होगा जहां देशी ही नहीं, विदेशी मेहमान भी इकठ्ठे हों। 
अब वो मेहमान देश-दुनिया को बता सकेंगे कि गुज्जू भाइयों को दिन-रात गरियाने वालों की असली औकात है क्या। वो दिखा सकेंगे कि कभी किसी तरह पद या कुर्सी पा जाने से कूकुर की फितरत नहीं बदल जाती। नस्ल कोई भी क्यों न रही हो, मूल प्रवृत्ति तो वही रहती है। 
गुज्‍जू भाई जानते हैं भोंकने के आदी ये लोग बेशक भोंकने से बाज अब भी नहीं आऐंगे, लेकिन अब अपने बचाव में भोंकेंगे। गौर कीजिएगा कि अब ये जब कभी भोंकना शुरू करेंगे तो इनकी दुम दबी होगी क्योंकि वही इस प्रजाति की कड़वी सच्‍चाई है जिसे गुज्‍जू भाई एक झटके में सामने ले आए। जय हिंद। जय भारत। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

Monday, 22 April 2024

किस्सा कुर्सी का: घुंघुरू सेठ... शुगर, ईडी, सीबीआई और आम के फेर में फंसे खास आदमी

 


 










"आम" से "खास आदमी" बने AAP के दिल्ली वाले घुंघुरू सेठ तो बड़े "खदूस" निकले। सेठ जी जेल प्रवास के दौरान भी न केवल "सेठानी" के हाथ से बने पकवानों का मजा लूट रहे हैं बल्‍कि मधुमेह जैसी बीमारी को भी ठीक उसी अंदाज में चुनौती दे रहे हैं जैसे तिहाड़ जाने से पहले ED और CBI को दिया करते थे। कहते थे कि हिम्मत है तो हाथ डाल कर दिखाएं, लाखों घुंघुरू सेठ दिल्ली की सड़कों पर दिखाई देंगे। ये बात अलग है कि घुंघुरू सेठ की चुनौती को स्‍वीकार करते हुए जब ED ने उनके गले पर हाथ डालकर हवालात में ला ठूंसा, तो दिल्ली के किसी कोने से 'चूं' की आवाज भी सुनाई नहीं दी। 

जो आवाजें सुनाई दे भी रही हैं, वो AAP के उन्‍हीं खास आदमियों की हैं जिन्‍होंने AAP के साथ ही आम आदमी की आत्मा का पिंडदान कर दिया था। वो अब खास से खासमखास बनने की जुगाड़ में हैं और इसलिए उसी तरह की हरकतें कर रहे हैं जिस तरह की हरकतें आप तिहाड़ में कर रहे हैं। 
फर्क सिर्फ इतना है कि आप बाहर निकलने की जुगत में हैं और वो आपको लंबे समय तक अंदर रखने का बंदोबस्त करने में लगे हैं। आप अपनी शुगर बढ़ा रहे हैं जिससे मेडिकल ग्राउंड पर बेल मिल जाए और वो उसे कम कराने के लिए "इंसुलिन" मांग रहे हैं ताकि सब-कुछ ठीक हो जाए और मेडिकली फिट-फाट होकर आप 'तिहाड़ी लुत्फ़' उठाते रहें। 
घुंघुरू सेठ, आपको याद होगा कि आपने अपनी जेल यात्रा से पहले और अपने साथियों के जेल प्रवास पर बहुत कुछ ऐसा कहा था जिसका बड़ा गूढ़ अर्थ था। जैसे वो तो 'सेनानी' हैं। साल-दो साल भी रहना पड़ा तो हंस-हंस के काट लेंगे, लेकिन जब आपकी बारी आई है तो आपका रो-रोकर बुरा हाल है। 
वैसे घुंघुरू सेठ एक बात तो तय है कि आपकी जिह्वा पर देवी सरस्‍वती विराजती हैं। आपके पुराने वीडियो देखे। उन्‍हें देखने के बाद इस बात का इल्म हुआ, अन्यथा आपकी 'सरकार' बन जाने के बाद भी हम तो आपको वही फटोली टाइप का चप्‍पल चटकाता हुआ आम आदमी समझते रहे। हमें पता ही नहीं था कि कभी ठेल-ढकेलों पर गोलगप्पे खाने वाला झोलाछाप शर्ट में लिपटा हुआ यह आदमी इतना शातिर निकलेगा कि ED और CBI को भी 'मीठी गोली' दे देगा। 
नतीजा जो भी हो, फिलहाल चुनावों के बीच घुंघुरू सेठ चर्चा में हैं और उनका शुगर लेवल राष्‍ट्रीय स्‍तर की बहस का मुद्दा बना हुआ है। हालांकि आश्चर्य इस बात पर जरूर हो रहा है कि घुंघुरू सेठ को घर से आम, मिठाई तथा पूरी जैसे पकवान भेजने वाली सेठानी ने अचानक चुप्पी साध ली है। डाइट चार्ट को ताक पर रखकर 'तर माल' भेजने वाली सेठानी की चुप्पी आने वाले तूफान का संकेत दे रही है क्योंकि कहते हैं "राजनीति" में कोई किसी का स्‍थायी दोस्‍त या दुश्मन नहीं होता। कुल मिलाकर मामला कुर्सी का है और कुर्सी जो न करवा दे, वो थोड़ा है। 
कुर्सी यदि बच्‍चों के सिर की कसम तुड़वा सकती है। 'अनीति' से 'शराब नीति' बनवा सकती है। 'विश्वास' के साथ धोखा कर सकती है और सत्य के प्रतीक 'सत्येन्‍द्र' को झूठ के पुलिंदे में तब्दील करा सकती है, तो सेठानी से भी सब-कुछ करा सकती है। कुर्सी पर बैठने की रिहर्सल तो सेठानी कर ही चुकी हैं। बस उसे अमलीजामा पहनाना बाकी है। 
दरअसल, सेठानी भी जानती हैं कि घुंघुरू सेठ चाहे जितने पैर पीट लें... वो लंबे नप चुके हैं। उनका शुगर लेवल हाई रहे या लो, लेकिन उनका अपना लेवल अब शायद ही उठ सके। 
भरोसा न हो इस बात पर तो एक नजर यूपी के उन मियां साहब की हालत पर डाल लें जिनके नाम का अर्थ ही उर्दू में "महान और पराक्रमी" होता है और कभी सत्ता के गलियारों में उनकी एक आवाज से बड़े-बड़े शूरमाओं का पायजामा ढीला हो जाया करता था लेकिल आज बेचारे वैसे ही सींखचों के पीछे पाए जाते हैं जैसे कि घुंघुरू सेठ बैरक नंबर दो में पाए जाते हैं।  
वैसे घुंघुरू सेठ के नाम का अर्थ ही "कमल" होता है। इस नजरिये ये देखें तो घुंघुरू सेठ खुद से लड़ रहे हैं। और खुद से लड़कर कोई जीता है क्या।बेहतर होगा कि वह अपने अब तक किए पापों का प्रायश्चित पूरी ईमानदारी से कर लें और सेठानी को चुपचाप कुर्सी सौंपकर तिहाड़ में उनके भी आने का मार्ग प्रशस्‍त करें। ईश्वर उनकी मदद जरूर करेंगे क्योंकि संभवत: ईश्वर के पास भी उनके इलाज का मात्र यही एक उपाय शेष है। आखिर अर्धांगिनी जो हैं। पाप-पुण्य में बराबर की भागीदार तो होंगी ही।  
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

Saturday, 17 September 2022

Twitter ने नेता निकम्मे कर दिए, वर्ना वो भी आदमी थे 'काम' के

 


 Twitter ने देश के तमाम नेताओं को निकम्मा बना दिया है, वर्ना वो भी कभी 'काम' के आदमी हुआ करते थे। ये नेता दिन-रात अब अपने बेडरूम से Twitter पर टर्राते रहते हैं इसलिए जनता भी इन्‍हें सीरियसली नहीं लेती। 

बहुतेरों ने तो इसके लिए भी स्‍टाफ रखा हुआ है। यानी Twitter पर भी उनकी जो चार लाइना 'बक-बक' दिखाई देती है, वो तक उनकी अपनी नहीं होती। उसमें उधार की अक्ल काम करती है। 

पहले यही नेता अपनी बात कहने के लिए 'प्रेस' के पास जाते थे। कुछ कहते थे तो कुछ सुनते भी थे। इस कहा-सुनी से उन्‍हें जमीनी हकीकत का पता लगता था और उसी के अनुरूप फिर वो अपनी दशा का अंदाज लगाकर दिशा तय करते थे। 
प्रेस के लोग भी अपनी जिम्‍मेदारी निभाते हुए इसी आधार पर उनकी चाल, चरित्र और चेहरे को जनता के बीच पेश करते थे। कुल मिलाकर एक प्रक्रिया थी, जिसका पालन सबको करना होता था। प्रेस को भी, और नेताओं को भी। 
चूंकि प्रेस शब्‍द अब मीडिया में परिवर्तित हो चुका है इसलिए वह माध्‍यम न रहकर मध्‍यस्‍थ बन गया है। वह नेताओं से सीधा संवाद करने की बजाय Twitter पर की गई उनकी टर्र-टर्र को ही नमक-मिर्च लगाकर परोस देता है। तुम्‍हारी भी जय-जय... हमारी भी जय-जय, न तुम हारे... न हम जीते। तुम भी टर्रा रहे हो, हम भी बर्रा रहे हैं। दोनों का काम चल रहा है।    
नेता समझ गए हैं कि मीडिया को कब माध्‍यम बनाना है और कब मध्‍यस्‍थ के तौर पर इस्‍तेमाल करना है इसलिए अब बाजार में 'ठप्पे वाले' मीडिया की भरमार है। ठप्‍पेवाला यह मीडिया भी जमकर Twitter-Twitter खेल रहा है। 
जो भी हो, Twitter पर चल रहे इस 'खेलानुमा खेल' ने निकम्‍मों की एक ऐसी फौज तैयार कर दी है जिससे नेताओं की नस्‍ल बिगाड़ कर रख दी। 
याद कीजिए 2012 का यूपी चुनाव। जमीन से जुड़े नेताजी के विदेश से डिग्री लेकर आए पुत्र ने सैकड़ों किलोमीटर साइकिल चलाई। जमकर पसीना बहाया, नतीजतन बाली उम्र में बहुमत की सरकार बनाने में सफल रहा। 
वही नेता पुत्र अब घर बैठकर लाल टोपी के साथ नीली चिड़िया उड़ाते रहते हैं और यदि कोई सहयोगी दल उनके इस शौक पर तंज कर दे तो उसे पार्टी से बाहर का रास्‍ता दिखाने में देर नहीं करते। 
आलम यह है कि नीली चिड़िया ने लाल टोपी के अंदर घोंसला बना लिया है लेकिन नेताजी हैं कि उन्‍हें चिड़िया ही दिखती है, घोंसला नहीं।   
उससे पहले दलितों की मसीहा भी खूब दौरे करती देखी जाती थीं इसलिए तीन बार दूसरों के सहारे और अंतिम बार बिना बैसाखी की सरकार बनाने में सफल रहीं। उसके बाद पता नहीं 'महारानी' को क्या हुआ कि उन्‍होंने मठ से निकलना ही बंद कर दिया। जिनको कभी नीली चिड़िया फूटी आंख नहीं सुहाती थी, अब उन्‍हें उसके रंग में रंगना ऐसा भा गया कि वह भी टर्र-टर्र करने लगीं। 
फिलहाल उन्‍होंने मीडिया से भी दूरी बना ली है, और जो कुछ कहती हैं वह Twitter पर ही कहती हैं। पार्टी दिन-प्रतिदिन रसातल को जा रही है किंतु महारानी मठ से निकलने को तैयार नहीं। अच्‍छा-भला वोट बैंक था किंतु अब उनके नोट बैंक की चर्चा तो होती है लेकिन वोट बैंक की नहीं। 
भारत जोड़ने निकले युवराज की पार्टी के नेता किसी जमाने में जनता से जुड़ाव के लिए पहचाने जाते थे लेकिन आज स्‍थिति बदल गई है। अब उसी के नेता अपनी पार्टी से जुड़कर नहीं रह पा रहे तो जनता से कैसे जुडें। 
शायद यही कारण है कि भारत जोड़ो को लेकर लोग सवाल उठाते हुए कह रहे हैं कि मियां पहले पार्टी तो जोड़ लो, भारत बाद में जोड़ लेना। पार्टी को जोड़े बिना भारत जोड़ने का काम ना हो पाएगा। पार्टी जुड़ी रही तो भारत अपने आप आपसे जुड़ जाएगा क्योंकि कभी कश्‍मीर से कन्याकुमारी तक पार्टी के जरिए भारत से जुड़े थे। अब पार्टी को तोड़कर भारत जोड़ने निकलोगो तो कैसे जोड़ पाओगे। 
कश्‍मीर हाल ही में छूटा है और तुम जा पहुंचे कन्‍याकुमारी। कन्‍याकुमारी से निकले ही थे कि गोवा टूट गया। जुड़ता हुआ कुछ नहीं दिख रहा, टूटता हुआ रोज सामने आ रहा है। लगता है Twitter ने तुम्‍हारी भी मति भ्रष्‍ट कर दी है अन्‍यथा अनेक किंतु-परंतुओं के बाद भी कई करोड़ लोग यह मानते थे कि कुछ तो गांठ में अक्‍ल जरूर रही होगी। 
यात्रा पर निकलने से पहले Twitter जितना समय भी यदि अपनी पार्टी के नेताओं से मेल-मुलाकात में बिताया होता तो न G-23 खड़ा होता और न ये दिन देखने पड़ते। 
आज हाल यह है कि तुम यात्रा पर निकले हो तो पूरी पार्टी Twitter पर आ गई है। बड़ी संख्‍या में पुरानी पार्टी के नेता यहां नया खेल खेलने में लगे हैं और तुम हो कि सच स्‍वीकारने को तैयार नहीं। 
वैसे Twitter ने ऐसे कितने नेताओं को निकम्‍मा कर दिया, ये तो कुछ उदाहरण भर हैं। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

Wednesday, 7 September 2022

बहुत कन्फ्यूजन है भाई: कौन सा भारत जोड़ने निकले हैं राहुल बाबा, अंबानी-अडानी वाला या अपने वाला?


 कथित तौर पर पार्टी को तोड़ने के जिम्मेदार कांग्रेस के 'चिर कुंवर' राहुल बाबा अब 'भारत जोड़ने' निकल पड़े हैं। अपने जीवन के करीब 150 बहुमूल्‍य दिन वह भारत जोड़ने में जाया करने वाले हैं। हालांकि उन्‍होंने फिलहाल यह नहीं बताया कि वह किस भारत को जोड़ने पर आमादा हैं। 

राहुल बाबा वर्षों से लोगों को बता रहे हैं कि भारत एक नहीं, दो हैं। एक अमीरों का भारत जिसे वो अडानी-अंबानी का भारत बताते हैं और दूसरा गरीबों का भारत जिसे वो अपना मानकर चलते हैं। जाहिर है कि वो अपने वाले भारत को ही जोड़ने निकले होंगे क्योंकि अंबानी-अडानी वाला भारत मोदी जी का भारत है। उसे वो क्यों जोड़ने लगे। 
बहरहाल, मुंह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए अरबपति परिवार के उत्तराधिकारी राहुल बाबा को लगता है कि भारत एक खिलौना है जो उनके हाथ से छीन लिया गया है, और जिन्‍होंने छीना है वो इस खिलौने से खेलने लायक नहीं हैं। वह इसे खंडित कर रहे हैं। 
राहुल की सोच वाला एक और तबका है, और वो भी भारत जोड़ने निकला हुआ है। यह तबका है विपक्ष। इस तबके में शामिल लोगों के अनुसार विपक्ष ही असल भारत है, लिहाजा विपक्ष एकजुट हो गया तो समझो भारत जुड़ गया। लेकिन परेशानी यह है कि इस तबके के लोग सिर्फ 'दल' जोड़ने  की बात कर रहे हैं, 'दिल' जोड़ने की नहीं। उनके दिलों के बीच 'पीएम पद' आड़े आ रहा है।  
जिस प्रकार उच्‍चकोटि के मनुष्‍य जीवन पर्यन्‍त मात्र मोक्ष की कामना में लगे रहते हैं, उसी प्रकार हर नेता की कामना होती है कि येन-केन-प्रकारेण वह एकबार पीएम पद प्राप्‍त कर ले तो 'इहिलोक' के साथ-साथ शायद 'परलोक' भी सुधर जाएगा। 'पूर्व प्रधानमंत्री' के तमगे वाली कुर्सी वहां भी साथ ले जा सकेंगे। 'चित्रगुप्त' फिर जनसामान्य की तरह व्‍यवहार नहीं कर पाएंगे। विशिष्‍टता साथ चिपकी होगी।  
यही कारण है कि विपक्ष के भारत जोड़ो अभियान की सफलता में 'नायकों' की संख्‍या आड़े आ रही है। प्रधानमंत्री का पद एक है किंतु उस पर दावा करने वाले विपक्षी अनेक हैं। 
ओलम का पहला अक्षर होने के नाते 'अरविंद' (केजरीवाल) से शुरू करें तो अखिलेश यादव कहते हैं कि मेरा नाम भी 'अ' से प्रारंभ होता है। केसीआर की मानें तो हिंदी वर्णमाला के व्‍यंजन जहां से शुरू होते हैं वो उनके नाम का पहला अक्षर है। इसलिए वही उचित होगा। ममता बनर्जी कहती हैं कि उनके नाम में पहले आदरणीय आता है, उसके बाद बनर्जी, और फिर अंत में ममता। 'अल्फाबेट' के अनुसार उनका नाम में A के साथ B जुड़ा है इसलिए वही पीएम पद की मौलिक हकदार हैं। उनके सामने न तो 'अरविंद' का 'केजरीवाल' टिकता है और न कल्वाकुंतला चंद्रशेखर राव यानी केसीआर के हिज्‍जे K C R कहीं मुकाबला कर सकते हैं। 
सुशासन बाबू का 'सु' त्‍यागकर शासन पर काबिज रहने वाले नीतीश कुमार कह तो ये रहे हैं कि उनके मन में पीएम पद की कोई अभिलाषा नहीं है किंतु उनकी यह बात कोई मान नहीं रहा। लोग कह रहे हैं कि पलटी मारने में उनका कोई सानी नहीं है, यह वो बार-बार सिद्ध कर चुके हैं इसलिए जो वो कह रहे हैं, उसका 'पलट' अभी से मानकर चलने में ही भलाई है। 
यूं भी राबड़ी पुत्र पहले दिन से माला फेर रहे हैं कि 'चचा नीतेशे बाबू' की नजर दूर की कुर्सी पर अटकी रहे तो वो पास की कुर्सी खिसका लें और देश-दुनिया को बता दें कि 'पलटूराम' के खिताब पर किसी एक का अधिकार नहीं ना है। 
कन्याकुमारी से भारत जोड़ने निकले राहुल बाबा का दावा है कि पीएम पद के एकमात्र स्‍वाभाविक एवं योग्य प्रत्‍याशी सिर्फ और सिर्फ वही हैं। नेहरू से चलकर गांधी तक के सरनेम देखेंगे तो सबकुछ साफ हो जाएगा। वाड्रा को बाद में देख लीजिएगा। 
नेहरू-गांधी ने 3 पीएम देश को दिए हैं। राहुल बाबा पहले भी कई बार पूछ चुके हैं कि मेरे पास तीन-तीन पीएम की विरासत है, तुम्‍हारे पास क्या है....हैं ?     
जो भी हो... कुल मिलाकर पीएम की कुर्सी को खंड-खंड करने में व्‍यस्‍त भारत को अखंड कैसे करेंगे, इसका तो पता नहीं किंतु इतना जरूर पता है कि भारत हो या पीएम की कुर्सी, उसका विभाजन जिन्‍होंने किया है वही अब उसे जोड़ने निकले हैं। 
यहां 1947 वाले 'विभाजन' की बात नहीं की जा रही, अमीर-गरीब वाले भारत की बात की जा रही है। वैसे कोई कुछ भी समझने को स्‍वतंत्र है। परतंत्र हैं तो बस हम और आप जैसे लोग जिन्‍हें यही नहीं पता कि भारत को तोड़ने और जोड़ने की परिभाषा अलग-अलग क्यों है, और हर दिन लोकतंत्र की हत्या होने के बावजूद वह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कैसे बना हुआ है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 
 

Saturday, 15 January 2022

चचा तो बहुत गुस्‍से में थे, क्या आपको भी आता है दलबदलुओं पर गुस्‍सा?


 चाय की दुकान पर चल रही चुनावी चकल्‍लस से निकलकर सीधे चले आ रहे चचा बहुत गुस्‍से में थे। ऐसे में उन्‍हें रोकना या टोकना यूं तो किसी आवारा सांड़ को लाल कपड़ा दिखाने जैसा था, किंतु चुनावी चर्चा से निकली चाशनी चखने के चस्‍के ने रिस्‍क उठाने पर मजबूर कर दिया।

आम लोगों के मन में पत्रकारों की ‘बची खुची इज्जत’ को भी दांव पर लगाकर आखिर पूछ ही लिया- चचा क्या बात है, इतना क्यों गुस्‍साए हो… और किस पर गुस्‍साए हो?
करीब-करीब 70 बसंत देख चुके चचा ने सवाल के जवाब में पहले तो नथुने फुलाकर ऊपर से नीचे तक घूरा ताकि लिफाफा देखकर मजमून का इल्‍म हो सके, उसके बाद मुंह का मास्‍क नीचे करके थूक की बौछार सहित बोले- इन निर्लज्‍ज और निकम्‍मे नेताओं के इलाज का कोई आइडिया है जो टिकट की खातिर चुनाव से ठीक पहले अपना बाप बदलने में कोई शर्म महसूस नहीं करते। हो तो बताओ, नहीं तो चलते बनो। खामखां दिमाग मारने का मेरा माद्दा बीत चुका है।
सुना होगा…खाली दिमाग शैतान का घर होता है। इससे पहले कि मेरा शैतान जाग जाए, चुपचाप खिसक लो वर्ना कहीं ऐसा न हो कि नेताओं की नीचता से उपजा गुस्‍सा यहीं निकल जाए।
पूरा धैर्य धारण कर चचा के गुस्‍से को मोड़ने की मंशा से कहा, चचा इसके लिए तो पब्‍लिक भी जिम्‍मेदार है जो चुपचाप इन्‍हें वोट डाल आती है। कभी इनसे नहीं पूछती कि जनता को धोखा देना कब छोड़ोगे।
पब्‍लिक के पास विकल्‍प है ही क्या। उसकी मजबूरी है इन्‍हीं ऐसे नीच, निर्लज्‍ज और दोगले नेताओं को चुनना जिनका न कोई दीन है और न ईमान। इन्‍हें पूरे कुनबे खानदान को चुनाव लड़ाना है क्योंकि वो जाहिल एवं गंवार दूसरा कोई और काम कर ही नहीं सकते।
चचा को असंसदीय शब्‍दों का प्रयोग करने से रोकने की कोशिश की तो वो भड़क गए। कहने लगे, जिन्‍हें न संसद की गरिमा का ख्‍याल है और न जनभावनाओं का, उनके लिए खालिस गालियां भी असंसदीय नहीं हो सकतीं भाई।
जिन्‍होंने संसद को भी मछली बाजार बना दिया है और जिनका असंसदीय आचरण किसी सड़कछाप गुण्‍डे को भी लज्‍जित करने के लिए काफी है, उन्‍हें संसदीय शब्‍दों से सुसज्‍जित करने की बात तो ना ही करें।
सच पूछो तो ये छूछी गालियां खाने के हकदार हैं। हालांकि, दिक्कत ये है कि जुबान गंदी करके भी इनकी ‘गिरगिटिया मानसिकता’ बदली नहीं जा सकती।
इनका इलाज अगर किसी के पास है तो वो भी इनके अपने आकाओं के पास ही है। यानी भिन्‍न-भिन्‍न दलों की राजनीति करने वाले इनके आकाओं के पास। वो यदि ये तय कर लें कि दल बदलुओं को पहले पांच साल सिर्फ और सिर्फ संगठन के लिए काम करना होगा। उसके बाद पार्टी विचार करेगी कि चुनाव लड़वाया जाए या नहीं, तो कुछ समस्‍या हल हो सकती है।
चचा की बात में दम देख उन्‍हें और थोड़ा कुरेदा तो कहने लगे- तुम्‍हीं बताओ भाई… किसी भी तरह एक मर्तबा सफल होने के बाद पूरी जिंदगी का मुकम्‍मल इंतजाम किसी दूसरे धंधे में हो सकता है क्या?
एकबार चुनकर आने का मतलब है ताजिंदगी पेंशन पाने का अधिकार, वो भी बिना कुछ किए धरे।
आम आदमी एड़ियां रगड़ रगड़ कर मर जाता है लेकिन बच्‍चों का भविष्‍य सुरक्षित नहीं कर पाता और इन हरामखोरों की हवस ही पूरी नहीं होती। अपने साथ-साथ अपनी निकम्‍मी औलादों को भी देश पर थोपते जा रहे हैं।
जैसे देश न हुआ, किसी सुल्‍तान का हरम हो गया जिसमें वो जितनी चाहें बांदियां और जितने चाहें ‘उभयलिंगी’ गुलाम पाल सकें।
चचा ने स्‍पष्‍ट किया कि वो नेताओं की औलादों को उभयलिंगी क्यों कह रहे हैं। उनकी दृष्‍टि से उभयलिंगी वो नहीं है जो प्रकृति प्रदत्त किसी शारीरिक खामी का मोहताज है, सही अर्थों में उभयलिंगी वही है जो मौकापरस्‍त है और अपनी कुत्‍सित क्रियाओं की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक नीचे गिर सकता है।
चचा से चर्चा के बाद यह सोचकर एक सुखद अनुभूति भी हुई कि आज नहीं तो कल, राजनीतिक दलों को प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह चलाने वाले ये सोचने पर जरूर मजबूर होंगे कि मत-दाता का मत बदलने से पहले उन्‍हें बदल जाना चाहिए। अन्‍यथा वो दिन दूर नहीं जब चुनाव-दर-चुनाव तमाशा देख रहे लोग इन्‍हें जूता हाथ में लेकर दौड़ाने लगेंगे और तब इनका आलिंगन करने को न कोई दल बचेगा, न दिल। फिर इनकी वो औलादें जिनकी खातिर आज ये अपनी निष्‍ठाएं कपड़ों की तरह बदलते हैं, राजनीति से हमेशा हमेशा के लिए तौबा करती नजर आएंगी।
जय हिंद, जय भारत!
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

Tuesday, 1 June 2021

UP विधानसभा चुनाव: अबकी बार, किसकी सरकार.. योगी, भोगी या फिर मनोरोगी


 2021 में कोरोना के बीच चूंकि पांच राज्‍यों के चुनाव हो चुके हैं इसलिए पूरी उम्‍मीद है कि परिस्‍थितियां चाहे जैसी हों किंतु 2022 में भी जहां-जहां चुनाव होने हैं, वहां होकर रहेंगे।

हों भी क्‍यों नहीं। हमारे देश में चुनाव एक उत्‍सव की तरह होते हैं, काम की तरह नहीं। कोरोना जैसी मनहूसियत के चलते ऐसे उत्‍सव होते रहने चाहिए। और भी तो बहुत कुछ हो रहा है… हो चुका है और होता रहेगा, तो चुनाव कराने में हर्ज ही क्‍या है।
बहरहाल, मुद्दे की बात यह है कि 2022 के शुरू में ही देश के सबसे महत्‍वपूर्ण राज्‍य UP के विधानसभा चुनाव होने हैं।
चुनाव होने में हालांकि अभी कुछ महीने बाकी हैं लेकिन सवाल हवा में तैरने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि अबकी बार, किसकी सरकार।
सवाल के जवाब में भी एक सवाल बड़ा रोचक उछल रहा है। यह सवाल है कि योगी, भोगी या फिर मानसिक रोगी। प्रतिप्रश्‍न वाजिब भी है और समयानुकूल भी।
दरअसल, पहले तो सत्ता की इस लड़ाई में सिर्फ और सिर्फ झकाझक सफेद कपड़ों वाले बगुला भगत ही आमने-सामने होते थे, लेकिन एक योगी ने बहुत कुछ बदल दिया है।
इस बदलाव का ही नतीजा है कि ‘भोगी’ उन नेताओं के लिए कहा जा रहा है जो सत्ता का सुख भोग चुके हैं और किसी भी तरह फिर से उस सुख को पाना चाहते हैं। इनके लिए किसी मठ से निकला गेरुआ वस्‍त्रधारी कोई ‘योगी’ एक आपदा की तरह है।
‘योगी’ को आपदा मानने वालों की श्रेणी में एक वर्ग ऐसा भी है जिसने खुद भले ही सत्ता का स्‍वाद कभी नहीं चखा किंतु वह चांदी की चम्‍मच मुंह में डालकर सत्ताधीशों के यहां पैदा हुआ है लिहाजा वह सोचता है कि सत्ता केवल उसकी विरासत है।
इनकी नजर में ‘योगी’ और ‘भोगी’ उसके कारिन्‍दे तो हो सकते हैं परंतु उन्‍हें सत्ता पर बैठने का कोई हक नहीं है। वो इन्‍हें आदेश देने के लिए नहीं, आदेश मानने के लिए हैं इसलिए ऐसे लोगों को कभी कुर्सी पर बैठायेंगे भी तो वही बैठायेंगे। बेशक लोकतंत्र का ढोल बजता रहे, चुनाव होते रहें लेकिन ‘गले में पट्टा’ उन्‍हीं का पड़ना चाहिए।
बहरहाल, इसी सोच से चंद वर्षों में एक तीसरा वर्ग भी उपज आया है। इस वर्ग को नाम दिया गया है ‘मनोरोगी’। ये वो वर्ग है जो सत्ता सुख छिन जाने की वजह से अपना मानसिक संतुलन खो बैठा है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि करे तो क्‍या करे। पागलों की तरह लकीर को मिटाने में लगा है लेकिन लकीर है कि लंबी होती जा रही है।
ये वर्ग दिन-रात सारी शक्‍ति लगाकर अपने सामने खींची गई इस लाइन को बिगाड़ने में लगा है। कभी-कभी उसकी पूंछ पकड़ भी लेता है और कुछ हिस्‍सा छोटा करने में कामयाब हो जाता है लेकिन अपनी कोई लाइन नहीं बना पा रहा।
जाहिर है कि इस मानसिक स्‍थिति में यह वर्ग मनोरोगी होता जा रहा है, और दुर्भाग्‍य से उसकी इस दशा और दिशा से लोग भी वाकिफ हो चुके हैं।
यही कारण है कि चुनावों से महीनों पहले पूछा जाने लगा है- यूपी में इस बार किसकी सरकार… योगी, भोगी या फिर मनोरोगी।
चूंकि सवाल जनता का है और जवाब भी जनता को ही देना है इसलिए इंतजार है 2022 का। क्‍योंकि तभी पता लगेगा कि जनता अपने लिए किसे चुनती है और सीएम की कुर्सी के पीछे एकबार फिर गेरूआ तौलिया टंगता है या भक्‍क सफेद।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी