पाकिस्तान के कराची, सिंध के वाशिंंदे और अब कनाडा निवासी एक मशहूर शायर सलमान हैदर की एक कविता ‘मैं भी काफ़िर, तू भी काफ़िर’ इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। यूं तो यह कविता बहुत लंबी है लेकिन इसकी कुछ लाइनें इस प्रकार हैं- सुर भी काफ़िर, ताल भी काफ़िर, भांगड़ा, नाच, धमाल भी काफ़िर ।
वारिस शाह की हीर भी काफ़िर, चाहत की जंजीर भी काफ़िर ।।
हंसना-रोना कुफ्र का सौदा, कला और कलाकार भी काफ़िर ।
जो मेरी धमकी न छापे, वह सारे अखबार भी काफ़िर ।।
मंदिर में तो बुत होता है, मस्जिद का भी हाल बुरा है ।
कुछ मस्जिद के बाहर काफ़िर, कुछ मस्जिद के अंदर काफ़िर ।।
वारिस शाह की हीर भी काफ़िर, चाहत की जंजीर भी काफ़िर ।।
हंसना-रोना कुफ्र का सौदा, कला और कलाकार भी काफ़िर ।
जो मेरी धमकी न छापे, वह सारे अखबार भी काफ़िर ।।
मंदिर में तो बुत होता है, मस्जिद का भी हाल बुरा है ।
कुछ मस्जिद के बाहर काफ़िर, कुछ मस्जिद के अंदर काफ़िर ।।
सलमान हैदर की इस कविता को गौर से पढ़ेंगे तो पता लगेगा कि आप तो पैदायशी काफ़िर हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं मानते।
बहरहाल, इस समय मुद्दा कुछ और है इसलिए बात उस पर कर ली जाए।
बात कुछ ऐसी है कि हाल ही में आपने कॉकरोचों के आंदोलन की आड़ लेकर अपनी बुरी सी शक्ल में एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है।
इस वीडियो में आप कह रहे हैं कि ''अगर एक जाहिल इस मुल्क की रहनुमाई करे, तो उसका दिल यही चाहेगा कि पूरा मुल्क उसी की तरह जाहिल, नासमझ, नाकाबिल और बेरहम बने। इस वक्त मेरा दिल भी भरा हुआ है और मैं गुस्से से खौल गया हूं ये देखकर कि हमारे बच्चों के साथ किस तरह जुल्म का बर्ताव किया जा रहा है गुंडों के हाथों। कभी ये भी सोचा करो कि तुम्हारा अंजाम तुम्हें भी एक दिन मिलेगा जरूर। इस मुल्क की हुकूमत को मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि सब याद रखा जाएगा...''
बहरहाल, इस समय मुद्दा कुछ और है इसलिए बात उस पर कर ली जाए।
बात कुछ ऐसी है कि हाल ही में आपने कॉकरोचों के आंदोलन की आड़ लेकर अपनी बुरी सी शक्ल में एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है।
इस वीडियो में आप कह रहे हैं कि ''अगर एक जाहिल इस मुल्क की रहनुमाई करे, तो उसका दिल यही चाहेगा कि पूरा मुल्क उसी की तरह जाहिल, नासमझ, नाकाबिल और बेरहम बने। इस वक्त मेरा दिल भी भरा हुआ है और मैं गुस्से से खौल गया हूं ये देखकर कि हमारे बच्चों के साथ किस तरह जुल्म का बर्ताव किया जा रहा है गुंडों के हाथों। कभी ये भी सोचा करो कि तुम्हारा अंजाम तुम्हें भी एक दिन मिलेगा जरूर। इस मुल्क की हुकूमत को मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि सब याद रखा जाएगा...''
ठहरिए मियां, अपनी उम्र और हालात पर तरस खाइए। इतना मत उबलिए कि जलकर ख़ाक हो जाएं क्योंकि आपका धर्म आपको ख़ाक हो जाने की इजाजत नहीं देता। आपको तो कब्र में लेटाया जाएगा। और यदि आप इसी तरह गुस्से से उबल-उबल कर किसी दिन मिट्टी में मिल गए तो आप जाते-जाते काफ़िर साबित हो जाएंगे। जो शायद न आपके लिए ठीक होगा, और न आपकी कौम के लिए।
कौम से मतलब किसी धर्म विशेष से नहीं है, उस जमात से है जिसे निजी स्वार्थों की पूर्ति में बाधक बनने वाला हर व्यक्ति ज़ालिम और जाहिल नजर आता है और वो उसके विरोध में इतनी उतावली तथा अंधी हो जाती है कि देश के साथ गद्दारी पर उतर आती है।
खैर, चिंता इस बात की है कि अगर आप ख़ाक हो गए तो जन्नत की बजाय जहन्नुम नसीब होगा। ऐसे में आपकी अपनी कौम के प्रति ये वफादारी किसी काम नहीं आएगी। कब्र में पैर लटकाए बैठे हो इसलिए फिर कोई ऐसा वीडियो अपलोड करने से पहले सोचें जरूर।
और आपके मुताबिक जहां तक सवाल एक जाहिल द्वारा मुल्क की रहनुमाई करने का है तो मुझे लगता है कि सबसे बड़े जाहिल आप खुद हैं, क्योंकि आप जाहिल की परिभाषा ही नहीं जानते। यदि आप कागज के टुकड़ों यानी किसी डिग्री से किसी की योग्यता का आंकलन करते हैं तो तय है कि आप बुद्धि से कतई पैदल हैं।
रहीम और रसखान से लेकर ताजबीबी तथा सूर, कबीर एवं तुलसी दास से लेकर कुंभन दास तक पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। मियां जरा बताइए तो कि ये विभूतियां किस कॉलेज, यूनिवर्सिटी, गुरुकुल या विश्वविद्यालय में पढ़ी थीं।
इन्हें भी छोड़ दीजिए। यह बताइए कि जिस अकबर को आप महान बताते-बताते थकते नहीं हैं, वो कितना शिक्षित था। वो तो अंगूठा छाप था, और बमुश्किल अपने नाम का पहला अक्षर लिखना सीख पाया था। जाहिर है मियां, कि एजुकेशन और क्वालिफिकेशन दोनों अलग-अलग हैं। कागज के टुकड़ों पर मिली डिग्री किसी को पढ़ा-लिखा तो साबित कर सकती है लेकिन शिक्षित नहीं। जैसे आप पढ़े-लिखे चाहे जितने हों लेकिन माफ कीजिए, शिक्षित नहीं हैं।
इस तरह देखा जाए तो सही मायनों में जाहिल आप और आपके वो 'कथित बच्चे हैं' जिनके लिए आप गुस्से से उबल रहे हैं और जो अपने बाप-दादा की उम्र के उस व्यक्ति को कैमरे के सामने मां-बहन की गालियां दे रहे हैं जो आपके दुर्भाग्य तथा करोड़ों लोगों के सौभाग्य से फिलहाल तो देश की रहनुमाई कर ही रहा है।
उम्मीद है कि आगे भी करता रहेगा इसलिए सब याद रखने की जो धमकी आप उसे दे रहे हैं, जो सपने आप उसके अंजाम को लेकर देख रहे हैं, वो आपको दोजख मिलने तक पूरे नहीं होने के।
वैसे मियां नसरु, एक बात तो बताइए कि क्या बीए पास कोई आदमी सर्जन बन सकता है। मतलब कि क्या वो सर्जरी कर सकता है, नहीं न!
तो आपके हिसाब से देश के जितने नेता और उनके राजनीतिक वारिस बने बैठे हैं, वो सब भी जाहिल हुए क्योंकि उनकी पढ़ाई-लिखाई चाहे जिस विषय में हुई हो, राजनीति शास्त्र में तो नहीं हुई। ऐसे उत्तराधिकारियों की लिस्ट इतनी लंबी है कि गिनाने बैठे तो बहुत समय जाया हो जाएगा।
और हां, आपने अपने इस वीडियो में यह भी बताया है कि आप राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) तथा पूना फिल्म इंस्टीट्यूट से अभिनय सीखकर आए थे। आपकी कुछ फिल्में मैंने भी देखी हैं। लगता था कि आप अच्छे अभिनेता हैं। लेकिन अब मेरी यह धारणा बदल गई है। आपके इस ताजा वीडियो को देखकर तो लगता है कि दो-दो प्रतिष्ठित संस्थाओं से पढ़कर आने के बावजूद आप जाहिल के जाहिल ही रहे। आपने लिखा-पढ़ी में यहां से सर्टिफिकेट तो ले लिए लेकिन अभिनय नहीं सीख पाए। अभिनय से आपका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। अभिनय सीखे होते और काबिल अभिनेता होते तो इस तरह अपने गुस्से को इजहार न करते। आपकी तो अभिनय की पूरी पढ़ाई मिट्टी में मिल गई क्योंकि आपने देश तथा देश के प्रधानमंत्री को लेकर अपने मन में पाल रखी घृणा को सार्वजनिक कर दिया। ठीक उन कॉकरोचों की तरह जो जंतर-मंतर पर इकठ्ठा हुए थे, और जिनके लिए आप उबल रहे हैं। उम्र का लिहाज कीजिए। खून में इतना उबाल किसी लिहाज से आपके लिए ठीक नहीं है। वैसे आपसे ये उम्मीद तो नहीं है कि इतनी गूढ़ बातें आपके पल्ले पड़ेंगी, फिर भी कह दी हैं ताकि सनद रहें और वक्त जरूरत काम आएं। आमीन!
कौम से मतलब किसी धर्म विशेष से नहीं है, उस जमात से है जिसे निजी स्वार्थों की पूर्ति में बाधक बनने वाला हर व्यक्ति ज़ालिम और जाहिल नजर आता है और वो उसके विरोध में इतनी उतावली तथा अंधी हो जाती है कि देश के साथ गद्दारी पर उतर आती है।
खैर, चिंता इस बात की है कि अगर आप ख़ाक हो गए तो जन्नत की बजाय जहन्नुम नसीब होगा। ऐसे में आपकी अपनी कौम के प्रति ये वफादारी किसी काम नहीं आएगी। कब्र में पैर लटकाए बैठे हो इसलिए फिर कोई ऐसा वीडियो अपलोड करने से पहले सोचें जरूर।
और आपके मुताबिक जहां तक सवाल एक जाहिल द्वारा मुल्क की रहनुमाई करने का है तो मुझे लगता है कि सबसे बड़े जाहिल आप खुद हैं, क्योंकि आप जाहिल की परिभाषा ही नहीं जानते। यदि आप कागज के टुकड़ों यानी किसी डिग्री से किसी की योग्यता का आंकलन करते हैं तो तय है कि आप बुद्धि से कतई पैदल हैं।
रहीम और रसखान से लेकर ताजबीबी तथा सूर, कबीर एवं तुलसी दास से लेकर कुंभन दास तक पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। मियां जरा बताइए तो कि ये विभूतियां किस कॉलेज, यूनिवर्सिटी, गुरुकुल या विश्वविद्यालय में पढ़ी थीं।
इन्हें भी छोड़ दीजिए। यह बताइए कि जिस अकबर को आप महान बताते-बताते थकते नहीं हैं, वो कितना शिक्षित था। वो तो अंगूठा छाप था, और बमुश्किल अपने नाम का पहला अक्षर लिखना सीख पाया था। जाहिर है मियां, कि एजुकेशन और क्वालिफिकेशन दोनों अलग-अलग हैं। कागज के टुकड़ों पर मिली डिग्री किसी को पढ़ा-लिखा तो साबित कर सकती है लेकिन शिक्षित नहीं। जैसे आप पढ़े-लिखे चाहे जितने हों लेकिन माफ कीजिए, शिक्षित नहीं हैं।
इस तरह देखा जाए तो सही मायनों में जाहिल आप और आपके वो 'कथित बच्चे हैं' जिनके लिए आप गुस्से से उबल रहे हैं और जो अपने बाप-दादा की उम्र के उस व्यक्ति को कैमरे के सामने मां-बहन की गालियां दे रहे हैं जो आपके दुर्भाग्य तथा करोड़ों लोगों के सौभाग्य से फिलहाल तो देश की रहनुमाई कर ही रहा है।
उम्मीद है कि आगे भी करता रहेगा इसलिए सब याद रखने की जो धमकी आप उसे दे रहे हैं, जो सपने आप उसके अंजाम को लेकर देख रहे हैं, वो आपको दोजख मिलने तक पूरे नहीं होने के।
वैसे मियां नसरु, एक बात तो बताइए कि क्या बीए पास कोई आदमी सर्जन बन सकता है। मतलब कि क्या वो सर्जरी कर सकता है, नहीं न!
तो आपके हिसाब से देश के जितने नेता और उनके राजनीतिक वारिस बने बैठे हैं, वो सब भी जाहिल हुए क्योंकि उनकी पढ़ाई-लिखाई चाहे जिस विषय में हुई हो, राजनीति शास्त्र में तो नहीं हुई। ऐसे उत्तराधिकारियों की लिस्ट इतनी लंबी है कि गिनाने बैठे तो बहुत समय जाया हो जाएगा।
और हां, आपने अपने इस वीडियो में यह भी बताया है कि आप राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) तथा पूना फिल्म इंस्टीट्यूट से अभिनय सीखकर आए थे। आपकी कुछ फिल्में मैंने भी देखी हैं। लगता था कि आप अच्छे अभिनेता हैं। लेकिन अब मेरी यह धारणा बदल गई है। आपके इस ताजा वीडियो को देखकर तो लगता है कि दो-दो प्रतिष्ठित संस्थाओं से पढ़कर आने के बावजूद आप जाहिल के जाहिल ही रहे। आपने लिखा-पढ़ी में यहां से सर्टिफिकेट तो ले लिए लेकिन अभिनय नहीं सीख पाए। अभिनय से आपका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। अभिनय सीखे होते और काबिल अभिनेता होते तो इस तरह अपने गुस्से को इजहार न करते। आपकी तो अभिनय की पूरी पढ़ाई मिट्टी में मिल गई क्योंकि आपने देश तथा देश के प्रधानमंत्री को लेकर अपने मन में पाल रखी घृणा को सार्वजनिक कर दिया। ठीक उन कॉकरोचों की तरह जो जंतर-मंतर पर इकठ्ठा हुए थे, और जिनके लिए आप उबल रहे हैं। उम्र का लिहाज कीजिए। खून में इतना उबाल किसी लिहाज से आपके लिए ठीक नहीं है। वैसे आपसे ये उम्मीद तो नहीं है कि इतनी गूढ़ बातें आपके पल्ले पड़ेंगी, फिर भी कह दी हैं ताकि सनद रहें और वक्त जरूरत काम आएं। आमीन!
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