Thursday, 25 March 2021
देश के हर प्रदेश में हैं परमबीर, देशमुख और वाझे जैसे लोग लेकिन जो पकड़े जाएं वो चोर… बाकी सब साहूकार
मुकेश अंबानी के ‘एंटीलिया’ से उठे तूफान ने इस समय समूचे महाराष्ट्र की कानून-व्यवस्था को अपनी चपेट में ले रखा है। अंबानी हाउस के बाहर सड़क पर खड़ी की गई ‘जिलेटिन’ से भरी स्कॉर्पियो और उसमें अंबानी परिवार के लिए छोड़ी गई धमकी भरी चिठ्ठी का उद्देश्य भले ही फिलहाल सामने न आ पाया हो किंतु इतना जरूर सामने आ चुका है कि स्वतंत्रता के 73 सालों बाद भी देश की सरकारें न तो फिरंगियों से विरासत में मिले पुलिस बल का मूल चरित्र बदल पायी हैं और न राजनीति के निरंतर हो रहे अधोपतन को रोक पा रही हैं।इस अधोपतन का ही परिणाम है कि पॉलिटिशियन एवं पुलिस के गठजोड़ में ‘अपराधी’ रूपी एक अन्य तत्व का समावेश पिछले ढाई दशक के अंदर बड़ी तेजी के साथ हुआ, और यही गठजोड़ आज कभी कहीं तो कभी कहीं अपनी दुर्गन्ध से समूची व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़े करता रहता है।
आज स्थिति यह है कि राजनेता, अपराधी और पुलिस की तिकड़ी में से कौन कितना ज्यादा धूर्त साबित होगा, कहा नहीं जा सकता।
बेशक आज महाराष्ट्र की चर्चा लेकिन…
इसमें कोई दो राय नहीं कि एंटीलिया केस से उपजे हालातों के बाद जिस तरह के आरोप मुंबई के पुलिस कमिश्नर ने बाकायदा एक पत्र लिखकर महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख पर लगाए हैं, वैसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता किंतु क्या इसका यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि देश के दूसरे राज्यों में हालात इससे कुछ इतर हैं?
28 राज्यों और 9 केन्द्र शासित प्रदेशों से सुसज्जित भारत में क्या अन्यत्र कहीं पॉलिटिशियन, पुलिस एवं अपराधियों का अनैतिक गठबंधन काम नहीं कर रहा?
बात उत्तर प्रदेश की
यहां उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो चार वर्षों के दौरान योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने इस अनैतिक गठजोड़ को तोड़ने के लिए निसंदेह काफी अच्छे प्रयास किए हैं परंतु इसका यह मतलब नहीं कि यूपी इससे मुक्त हो चुका है।
योगीराज में ही 02 जुलाई 2020 की रात हुआ कानपुर का बिकरू कांड हकीकत बयां करने में सक्षम है कि किस तरह विकास दुबे नाम का एक दुर्दांत अपराधी फ्रंट फुट पर खेल रहा था, और यदि उसके हाथों एकसाथ आठ पुलिसजन न मारे गए होते तो संभवत: आगे भी खेलता रहता।
हां… इतना जरूर कहा जा सकता है कि पूर्ववर्ती सरकारें जिस बेशर्मी के साथ ऐसे नापाक गठजोड़ का अपने-अपने तरीकों से समर्थन करती थीं, वैसा आज सुनाई या दिखाई नहीं देता।
हालांकि अब भी उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के पर्याय रहे अफसर अच्छी तैनाती पाए हुए हैं क्योंकि उन्हें किसी न किसी स्तर से राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है।
पूर्व में प्रयागराज और बुलंदशहर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों पर भ्रष्टाचार एवं कदाचार के कारण की गई कार्यवाही से लेकर महोबा के एसपी की करतूतों तक ने पुलिस विभाग के साथ-साथ प्रदेश सरकार को भी शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, बावजूद इसके सबकुछ दुरुस्त नहीं हो पा रहा। तमाम दागी अधिकारी आज भी उसी प्रकार अच्छी पोस्टिंग पर बने हुए हैं जिस प्रकार पूर्ववर्ती सरकारों में थे।
हाल ही में सीएम योगी आदित्यनाथ द्वारा मंडल स्तरीय अधिकारियों को अपने सीयूजी फोन खुद रिसीव न करने पर चेतावनी सहित निर्देश देना यह साबित करता है कि नौकरशाही अब भी निरंकुश है और उसे आसानी से सुधारा भी नहीं जा सकता।
अनेक प्रयास करने पर भी आईएएस और आईपीएस अधिकारी अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा देने को तैयार नहीं हैं क्योंकि ऐसे अधिकारियों की गिनती उंगलियों पर ही की जा सकती है जिनके पास आय से अधिक संपत्ति न हो।
ऐसा नहीं है कि ये सच्चाई सिर्फ अधिकारियों तक सीमित हो। दूसरे-तीसरे और चौथे दर्जे तक के सरकारी कर्मचारियों का यही हाल है।
शेष भारत
उत्तर प्रदेश को भले ही एक नजीर मान लिया जाए लेकिन जम्मू-कश्मीर और लेह-लद्दाख से लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी पुलिस-प्रशासन का हाल कमोबेश एक जैसा ही है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि 28 राज्यों और 9 केन्द्र शासित प्रदेशों वाले इस देश में बहुत से बदलाव हुए हैं लेकिन यदि ऐसा कुछ है जो नहीं बदला तो वो है नापाक गठबंधनों का खेल।
एक ऐसा खेल जिसमें राज्य मायने नहीं रखते, जिसमें सीमाओं की अहमियत नहीं है, जिसमें भाषा-बोली भी आड़े नहीं आती क्योंकि पुलिस, पॉलिटिशियन और अपराधियों की चाल व चरित्र आश्चर्यजनक रूप से समान पाए जाते हैं।
माना कि परमबीर सिंह ने मुंबई के पुलिस कमिश्नर जैसे महत्वपूर्ण पद से हटाए जाने के बाद महाराष्ट्र के गृह मंत्री पर 100 करोड़ रुपए महीने की अवैध वसूली कराने जैसा गंभीर आरोप लगाया लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी बात कोई अहमियत नहीं रखती।
अवैध वसूली का यह खेल भी महाराष्ट्र की तरह दूसरे सभी राज्यों की पुलिस करती है, लेकिन हंगामा इसलिए बरपा है क्योंकि पहली बार किसी पुलिस अधिकारी ने सीधे-सीधे ‘सरकार’ को लपेटे में लेने का दुस्साहस किया है।
परमबीर सिंह को ये भी पता है कि नेता नगरी में उसके आरोपों को बहुत महत्व नहीं दिया जाएगा और किंतु-परंतु के साथ सारे आरोप हवा में उड़ाने की कोशिश होगी, संभवत: इसीलिए उन्होंने समय रहते सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
अब यदि सुप्रीम कोर्ट इसे नजीर मानकर कोई बड़ा निर्णय सुनाता है तो तय मानिए कि बात बहुत दूर तक जाएगी क्योंकि देश की सारी समस्याओं की जड़ में हर जगह अनिल देशमुख, परमबीर और सचिन वाझे ही पाए जाएंगे।
वजह बड़ी साफ है, और वो ये कि समय और परिस्थितियों के हिसाब से इनकी सूरत बेशक बदलती रहे, लेकिन सीरत जस की तस पायी जाती है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
Saturday, 20 March 2021
इस दौर में पत्रकार, मतलब कमजोर की ‘जोरू’
कभी पत्रकार भी होते होंगे बाहुबली, लेकिन इस दौर में पत्रकार होना…मतलब कमजोर की ‘जोरू’।बीती 11 तारीख को लाल टोपी वाले नेता ने अपने गुर्गों से मुरादाबाद के एक होटल में पत्रकारों का जमकर ‘सार्वजनिक अभिनंदन’ करा दिया। लाल टोपी वाले नेता जी पत्रकारों द्वारा कुछ ऐसे सवाल करने पर अचानक हत्थे से उखड़ गए जो उन्हें सख्त नापसंद थे।
हालांकि पत्रकारों ने नेताजी और उनके ‘दो दहाई’ गुर्गों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी लेकिन नेताजी के गुर्गों ने भी न केवल क्रॉस रिपोर्ट दर्ज कराई बल्कि खुद नेताजी ने अपने खिलाफ हुई एफआईआर की कॉपी टि्वटर पर शेयर करके लिखा कि योगी जी चाहें… तो मैं इस एफआईआर को लखनऊ में हॉर्डिंग्स पर लगवा दूं।
इस खुली चुनौती के बावजूद कल को लाल टोपी वालों के खिलाफ दर्ज एफआईआर एक्सपंज कर दी जाए और पत्रकारों को घर से घसीट-घसीट कर गिरफ्तार किया जाने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि पत्रकारों की नेताओं के सामने औकात ही क्या है। चूंकि पुलिस भी पत्रकारों के किसी तरह ‘फंसने’ की ताक में रहती है इसलिए मौका मिला नहीं कि कार्यवाही शुरू। फिर करते रहो लानत-मलामत, कोई पूछता है क्या।
बहुत दिन नहीं बीते जब एक राष्ट्रीय चैनल के अंतर्राष्ट्रीय संपादक और मालिक को मुंबई पुलिस उसके घर से डंडा-डोली करके ले गई थी। वहां भी मामला कुछ ऐसा ही था कि ये संपादक अपने चैनल पर चीख-चीख के सत्ताधारी दल के नेताओं की बखिया उधेड़ा करता था। मिट्टी के ‘शेर’ वाली पार्टी के मुखिया ने इस दहाड़ने वाले संपादक को फिलहाल तो मिमयाने लायक भी नहीं छोड़ा है, आगे की राम जानें।
इसी प्रकार कुछ वर्षों पहले सबसे तेज समाचार चैनल के रिपोर्टर को यूपी की एक क्षेत्रीय पार्टी के संस्थापक ने प्रश्न पूछने से नाराज होकर सरेआम इतना तेज ‘लपड़िया’ दिया था कि उनके तवे से काले गाल पर भी थप्पड़ की सुर्खी साफ-साफ दिखाई दे रही थी।
ये बात दीगर है कि आज वह रिपोर्टर, राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर विभिन्न टीवी चैनल्स की शोभा बढ़ाते देखे जा सकते हैं और एंकर द्वारा गुजरे जमाने के पत्रकार के रूप में परिचय दिए जाने पर चश्मे के अंदर से एंकर को कुछ इस तरह घूर कर ताड़ते हैं जैसे उसने अतीत का खाका खींचकर बड़ा वाला गुनाह कर दिया हो।
मफलरधारी मुखिया की पार्टी में सेवारत रहे इस कनवर्टेड राजनीतिक विश्लेषक का तार्रुफ़ यदि एक्स नेता बतौर कराया जाए तो इसे गुरेज नहीं होता किंतु पूर्व पत्रकार बताए जाने पर पपीता सा मुंह निकल आता है।
ऐसा शायद इसलिए कि तमाम उम्र पत्रकारिता में बिताने के बाद भी आखिर में उसे नवाजा गया तो थप्पड़ से, लेकिन चंद रोज नेतागीरी को देते ही राजनीतिक विश्लेषक का तमगा हासिल करते देर नहीं लगी।
कभी एक नेता के हाथों झन्नाटेदार चांटा खाने के बाद चश्मा उतारकर गाल को सहलाते हुए निकलने वाला यह टीवी पत्रकार आज टीवी पत्रकारों पर ‘गोदी’ मीडिया का ठप्पा लगाने से परहेज नहीं करता क्योंकि वह जान व समझ चुका है कि पत्रकार होने का मतलब ही ऐसे कमजोर की जोरू है जिसे राह चलता भी ‘भाभी’ बोलने का अधिकार रखता हो।
यदि ऐसा न होता तो न्यूज़ चैनल्स की डिबेट में हर ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा नेता बड़े से बड़े और नामचीन एंकर पर मनमर्जी तोहमत लगाकर चलता नहीं बनता, वो भी तब जबकि सवाल पूछना पत्रकार का पेशेगत धर्म व कर्म है।
माना कि ऊँच-नीच पत्रकारों से भी होती है… तो क्या नेता दूध के धुले हैं। टोपी लाल हो या सफेद अथवा हरी या नीली-पीली, बेदाग तो कोई नहीं… किंतु पत्रकारों पर जोर सबका चलता है।
पहले सिर्फ मुंह से बोलकर जोर चला लेते थे, अब हाथ-पैर भी चलाने लगे हैं क्योंकि जानते हैं कि पत्रकारों के भी ‘नेता’ होते हैं और ये नेता राजनीतिक दलों के नेताओं से कतई भिन्न नहीं होते।
इनके सिर पर किसी खास कलर की टोपी न हुई तो क्या, एक अदृश्य ‘कलंगी’ जरूर होती है। ये कलंगी जिस पत्रकार के सिर सज गई, समझो उसे सबको टोपी पहनाने का लाइसेंस मिल गया।
लाल टोपी वालों के मामले में भी देर-सवेर यही होने वाला है। किसी कलंगीधारी पत्रकार की कृपा से पिटने वाले पीटने वालों के सामने हाथ बांधे खड़े होंगे और पीटने वाले कल पूछे गए इस सवाल कि कितने में बिके हो, को इस बार घुमाकर पूछेंगे कि कितने में बिकोगे?
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
हालांकि पत्रकारों ने नेताजी और उनके ‘दो दहाई’ गुर्गों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी लेकिन नेताजी के गुर्गों ने भी न केवल क्रॉस रिपोर्ट दर्ज कराई बल्कि खुद नेताजी ने अपने खिलाफ हुई एफआईआर की कॉपी टि्वटर पर शेयर करके लिखा कि योगी जी चाहें… तो मैं इस एफआईआर को लखनऊ में हॉर्डिंग्स पर लगवा दूं।
इस खुली चुनौती के बावजूद कल को लाल टोपी वालों के खिलाफ दर्ज एफआईआर एक्सपंज कर दी जाए और पत्रकारों को घर से घसीट-घसीट कर गिरफ्तार किया जाने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि पत्रकारों की नेताओं के सामने औकात ही क्या है। चूंकि पुलिस भी पत्रकारों के किसी तरह ‘फंसने’ की ताक में रहती है इसलिए मौका मिला नहीं कि कार्यवाही शुरू। फिर करते रहो लानत-मलामत, कोई पूछता है क्या।
बहुत दिन नहीं बीते जब एक राष्ट्रीय चैनल के अंतर्राष्ट्रीय संपादक और मालिक को मुंबई पुलिस उसके घर से डंडा-डोली करके ले गई थी। वहां भी मामला कुछ ऐसा ही था कि ये संपादक अपने चैनल पर चीख-चीख के सत्ताधारी दल के नेताओं की बखिया उधेड़ा करता था। मिट्टी के ‘शेर’ वाली पार्टी के मुखिया ने इस दहाड़ने वाले संपादक को फिलहाल तो मिमयाने लायक भी नहीं छोड़ा है, आगे की राम जानें।
इसी प्रकार कुछ वर्षों पहले सबसे तेज समाचार चैनल के रिपोर्टर को यूपी की एक क्षेत्रीय पार्टी के संस्थापक ने प्रश्न पूछने से नाराज होकर सरेआम इतना तेज ‘लपड़िया’ दिया था कि उनके तवे से काले गाल पर भी थप्पड़ की सुर्खी साफ-साफ दिखाई दे रही थी।
ये बात दीगर है कि आज वह रिपोर्टर, राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर विभिन्न टीवी चैनल्स की शोभा बढ़ाते देखे जा सकते हैं और एंकर द्वारा गुजरे जमाने के पत्रकार के रूप में परिचय दिए जाने पर चश्मे के अंदर से एंकर को कुछ इस तरह घूर कर ताड़ते हैं जैसे उसने अतीत का खाका खींचकर बड़ा वाला गुनाह कर दिया हो।
मफलरधारी मुखिया की पार्टी में सेवारत रहे इस कनवर्टेड राजनीतिक विश्लेषक का तार्रुफ़ यदि एक्स नेता बतौर कराया जाए तो इसे गुरेज नहीं होता किंतु पूर्व पत्रकार बताए जाने पर पपीता सा मुंह निकल आता है।
ऐसा शायद इसलिए कि तमाम उम्र पत्रकारिता में बिताने के बाद भी आखिर में उसे नवाजा गया तो थप्पड़ से, लेकिन चंद रोज नेतागीरी को देते ही राजनीतिक विश्लेषक का तमगा हासिल करते देर नहीं लगी।
कभी एक नेता के हाथों झन्नाटेदार चांटा खाने के बाद चश्मा उतारकर गाल को सहलाते हुए निकलने वाला यह टीवी पत्रकार आज टीवी पत्रकारों पर ‘गोदी’ मीडिया का ठप्पा लगाने से परहेज नहीं करता क्योंकि वह जान व समझ चुका है कि पत्रकार होने का मतलब ही ऐसे कमजोर की जोरू है जिसे राह चलता भी ‘भाभी’ बोलने का अधिकार रखता हो।
यदि ऐसा न होता तो न्यूज़ चैनल्स की डिबेट में हर ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा नेता बड़े से बड़े और नामचीन एंकर पर मनमर्जी तोहमत लगाकर चलता नहीं बनता, वो भी तब जबकि सवाल पूछना पत्रकार का पेशेगत धर्म व कर्म है।
माना कि ऊँच-नीच पत्रकारों से भी होती है… तो क्या नेता दूध के धुले हैं। टोपी लाल हो या सफेद अथवा हरी या नीली-पीली, बेदाग तो कोई नहीं… किंतु पत्रकारों पर जोर सबका चलता है।
पहले सिर्फ मुंह से बोलकर जोर चला लेते थे, अब हाथ-पैर भी चलाने लगे हैं क्योंकि जानते हैं कि पत्रकारों के भी ‘नेता’ होते हैं और ये नेता राजनीतिक दलों के नेताओं से कतई भिन्न नहीं होते।
इनके सिर पर किसी खास कलर की टोपी न हुई तो क्या, एक अदृश्य ‘कलंगी’ जरूर होती है। ये कलंगी जिस पत्रकार के सिर सज गई, समझो उसे सबको टोपी पहनाने का लाइसेंस मिल गया।
लाल टोपी वालों के मामले में भी देर-सवेर यही होने वाला है। किसी कलंगीधारी पत्रकार की कृपा से पिटने वाले पीटने वालों के सामने हाथ बांधे खड़े होंगे और पीटने वाले कल पूछे गए इस सवाल कि कितने में बिके हो, को इस बार घुमाकर पूछेंगे कि कितने में बिकोगे?
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
Sunday, 14 February 2021
अपने प्रिय मित्र कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नाम एक खुला खत
कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी और मेरा रिश्ता यूं तो ठीक वैसा ही है जैसा मेरा देश के दूसरे नेताओं से है किंतु एक मामले में वो मेरे लिए अन्य नेताओं से अलग हैं।दरअसल, मैं उन्हें अपना मित्र मानता हूं और ये मित्रता पूरी तरह एकतरफा है। अब है तो है। इसमें कोई कर भी क्या सकता है। दिल के सौदे कुछ ऐसे ही हुआ करते हैं।
इसी ‘दिल-लगी’ के चलते मैं आज उन्हें एक खुला खत लिखने का दुस्साहस कर पा रहा हूं। बिना ये सोचे-समझे कि इसका अंजाम क्या होगा।
प्रिय मित्र राहुल जी, जैसा कि आप जानते और समझते ही होंगे कि हमारे देश में बिन मांगे सलाह देने की परंपरा बहुत पुरानी है इसलिए आज मैं भी आपको एक सलाह दे रहा हूं। ज़ाहिर है कि इसे मानना या न मानना आपके अपने बुद्धि-विवेक पर निर्भर करता है। मतलब आपको जो उचित लगे, वही ‘हश्र’ आप मेरी सलाह का कर सकते हैं।
सलाह ये है कि लिखा-पढ़ी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पदभार पुन: आपके कंधों पर डाल दिया जाए, उससे पहले आप एक ‘डीम्ड यूनिवर्सिटी’ स्थापित कर खुद को उसका कुलाधिपति घोषित कर दें। आप चाहें तो रणदीप सुरजेवाला को उसका कुलपति नियुक्त कर सकते हैं।
फैकल्टी के रूप में आपके पास पार्टी प्रवक्ताओं की ऐसी फौज पहले से मौजूद है जो आपके श्रीमुख से निकलने वाले प्रत्येक शब्द को तत्काल लपक कर न सिर्फ उसका विच्छेदन आपकी इच्छानुसार करने की योग्यता रखती है बल्कि कई बार उससे भी परे जाकर यह साबित करती है कि वो आपको, आपसे भी अधिक अच्छी तरह समझ रही है। इतना अच्छी तरह, जितना कि आपकी मॉम या बहिन भी नहीं समझ पातीं।
मेरी आपसे गुज़ारिश है कि इस यूनिवर्सिटी में सिर्फ और सिर्फ आपके अपने द्वारा गढ़ी गई राजनीति के गुर सिखाए जाएं, कोई दूसरा विषय न हो।
मसलन मामला कोई भी हो, उसे किसी भी तरह एक ही व्यक्ति या एक ही समूह पर कैसे केन्द्रित किया जा सकता है। खेत की बात को खलिहान की ओर, और खलिहान की बात को चीन तथा पाकिस्तान की ओर कैसे मोड़ा जा सकता है।
चूंकि आपके पास गुजरात के मुख्यमंत्री तथा देश के प्रधानमंत्री को किस्म-किस्म के अपशब्द कहने का एक लंबा अनुभव है इसलिए उस यूनिवर्सिटी में आपके द्वारा ईज़ाद किए गए ‘अपशब्दों’ का इस्तेमाल करने की विशेष ट्रेनिंग का इंतजाम किया जाए ताकि कांग्रेस सहित बाकी दूसरी पार्टियों के भावी नेताओं को राजनीति में ओछे हथकंडे अपनाने के तौर-तरीके सीखने अन्यत्र न जाना पड़े। आप चाहें तो उसकी फीस अतिरिक्त रख सकते हैं।
‘नेहरू-गांधी परिवार’ की राजनीतिक विरासत संभालने को आपके बाद वाली पीढ़ी में फिलहाल आपकी बहिन प्रियंका के ही बच्चे दिखाई देते हैं इसलिए भी जरूरी है कि वो आपके कटु लहजे को सहेजकर रख सकें और आगे चलकर यह लहज़ा उनके काम आ सके।
कांग्रेस को एकमात्र नेहरू-गांधी परिवार की ‘थाती’ मानने के कारण कोई अन्य कांग्रेसी इस गुरुत्तर भार को उठाने की योग्यता शायद ही हासिल कर सके इसलिए अति आवश्यक है कि समय रहते आपकी विधा को आपके भांजे-भांजी बखूबी प्राप्त कर सकें। कांग्रेस को कागजों में लपेटकर उसे अतीत बना देने के लिए ये ट्रांसफॉरमेशन अत्यंत जरूरी है, अन्यथा आपके ‘अपशब्द’ अनुपयोगी रह जाएंगे।
राहुल जी…! जिस प्रकार आपने संसद के अंदर कभी ‘आई विंंकिंग’ करके तो संसद के बाहर अध्यादेश फाड़कर कीर्तिमान स्थापित किए हैं, उनका भी कोई सानी नहीं लिहाज़ा नेताओं की आने वाली खेप को इस कला में दक्ष करने का भी मुकम्मल बंदोबस्त आप अपनी यूनिवर्सिर्टी में कर दें तो देश पर आपकी महती कृपा होगी तथा आने वाली नस्लें हमेशा आपके प्रति इस कार्य के लिए कृतज्ञ रहेंगी।
यकीन मानिए कि आपके पूज्य पूर्वजों स्व. जवाहर लाल नेहरू, स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी एवं स्व. श्री राजीव गांधी को ‘भारत रत्न’ चाहे जिन कारणों से मिला हो किंतु आपके लिए देश के इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान की व्यवस्था आपके इन्हीं कारनामों के कारण की जाएगी क्योंकि कभी प्रधानमंत्री न बनने का इंतजाम आप खुद अपने लिए लगातार कर ही रहे हैं।
और अंत में केवल यही कहूंगा कि ‘मोदी है तो मुमकिन’ है के नारे को जितना सार्थक आपने किया है, उतना शायद ही कोई दूसरा कर सके।
बस मुझे चिंता है तो इस बात की कि मोदी और भाजपा को अगले कई दशकों तक सत्ता सौंपे रहने की इस अपनी व्यवस्था में आप पता नहीं स्वाभाविक नींद की अवस्था तक पहुंच पाते होंगे या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको उसके लिए भी कोई अन्य ‘कारस्तानी’ करनी पड़ रही हो।
यदि ऐसा है तो आप बाकायदा एक माला लेकर अपनी चारपाई के पाये से बांध लें और नींद न आने की स्थिति में उस माला पर ‘मोदी नाम केवलम्’ का जाप यथोचित अपशब्दों के साथ करें। उस समय आप वो अपशब्द भी इस्तेमाल कर सकते हैं जिन्हें हम जैसे मामूली लोग अपनी भाषा में ‘गालियां’ कहते हैं। यकीन मानिए, आपको बहुत राहत मिलेगी और आप चैन की नींद सो सकेंगे।
हो सकता है कि इस आखिरी सलाह को मान लेने पर आपको सर्वाजनिक रूप से मोदी के सम्मान में उन शब्दों का प्रयोग न करना पड़े जिनके लिए आप कुख्यात हो चुके हैं और जो न सिर्फ आपके करियर बल्कि कांग्रेस के लिए भी कब्र खोदने का काम कर रहे हैं।
और हां, आप मेरी ये सलाह मान लेने के बावजूद आई विंंकिंग सहित उन सभी इशारों का उपयोग करने को स्वतंत्र हैं जिन्हें ‘मैंगो पीपल’ छिछोरों के लिए आरक्षित मान बैठा है। आमीन!
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
Sunday, 7 February 2021
70 साल में पहली बार किसानों का भोलापन… “सबसे भले वे मूढ़, जिन्हें न व्यापे जगत गति”
नए कृषि कानूनों को लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलनरत किसानों की ‘ये वैरायटी’ कितनी भोली है या कितनी चालाक, इसका इल्म तो फिलहाल नहीं हो पाया है… अलबत्ता इतना जरूर पता लग चुका है कि ‘उद्भट विद्वानों’ से भरे विपक्ष में कई नेता इतने ‘भोले’ हैं कि उन्हें ‘जगत गति’ व्याप ही नहीं रही।
इन नेताओं के भोलेपन का अंदाज आप इस बात से लगा सकते हैं कि मोदी सरकार नए कानूनों को खारिज़ न करके खुद अपनी रुख़सती का मुकम्मल इंतजाम कर रही है और विपक्ष इस बात पर आमादा है कि सरकार अपनी गलती दुरुस्त करके 2024 में भी जीतने की पक्की व्यवस्था कर ले।‘पप्पू’ का पर्यायवाची शब्द हालांकि किसी शब्दकोश में ढूंढ़े नहीं मिला लेकिन ऐसा विश्वास है कि यदि इसका कोई पर्यायवाची होता तो निश्चित ही ऐसे ही ‘भोलेपन’ को सार्थक करता हुआ होता जैसे भोलेपन का मुजाहिरा विपक्षी नेता कर रहे हैं।
‘पप्पू’ ही क्यों, ‘टीपू’ और ‘जीतू’ से लेकर ‘पप्पी’ व ‘मीतू’ तक का पर्यायवाची यही होता क्योंकि सबकी क्रिया एक जैसी है। वैसे तमाम विपक्षी नेताओं के भोलेपन ने यह भी साबित कर दिया है कि ‘भोलेपन’ का पेटेंट किसी एक पार्टी अथवा किसी एक नेता के पास नहीं है बल्कि देश भरा पड़ा है ऐसे ‘भोले-भाले’ नेताओं तथा उनके अनुकरणीय नुमाइंदों से।
जरा विचार कीजिए कि यदि ये नहीं होता तो मोदी सरकार के लिए ‘आत्मघाती’ साबित होने जा रहे नए कृषि कानूनों से पीछे हटने की सलाह विपक्ष क्यों देता।
उसे तो खुश होना चाहिए था कि अब 2024 में उसे सत्ता सौंपने की व्यवस्था भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने खुद-ब-खुद कर दी।
सच पूछो तो दुख होता है विपक्षी नेताओं के ऐसे भोलेपन पर, दया आती है उनकी इतनी सिधाई पर कि जिस भाजपा ने 2014 से उसे कहीं का नहीं छोड़ा, उसी के हित में डंडा-झंडा लेकर खड़े हो गए हैं।
बल, बुद्धि, विद्या सब जाया कर रहे हैं कि मोदी सरकार किसी तरह कृषि कानून वापस ले ले।
इन मासूम नेताओं को कोई यह समझाने वाला भी नहीं कि भाई… एकबार को मान लो कि यदि मोदी सरकार ने उनकी कही कर दी और अपने कदम खींच लिए तो सरकार से किसानों का बैर खत्म समझो, और बैर खत्म हुआ नहीं कि ‘एकबार फिर मोदी सरकार’ के नारे फिजा में तैरने लगेंगे। तब ये बेचारे भोले विपक्षी नेता क्या करेंगे।
हो सकता है कि किसी अक्ल के अंधे ने इनके कान में ये बात फूंक दी हो कि ऐसा हो गया तो उसका श्रेय आपको मिल जाएगा और चुनावों में इसका सीधा लाभ तुम्हें ही मिलेगा, तो जान लो कि ऐसा नहीं होने का।
वो इसलिए कि काजू-बादाम और किशमिश खाकर आंदोलन करने वाले ये वैरायटी किसान उनके जितने भोले नहीं हैं। वो जानते हैं कि कब नेताओं को अपने घड़ियाली आंसुओं में बहा ले जाना है और कब विज्ञान भवन में सरकार के साथ सौदेबाजी के लिए जाना है।
वैरायटी खेती की हो या किसान की, होती बड़े काम की चीज है अन्यथा ‘एक ही टोपी’ समूचे विपक्ष को पहनाने की कला हर किसी को नहीं आती।
वैसे राज्यों के चुनाव तो 2021 में भी होने हैं और 2022 में भी, ऐसे में तो विपक्ष को वो प्रयास करने चाहिए कि सत्ता पक्ष इसी तरह अपनी जिद पर अड़ा रहे। किसी तरह किसानों की कोई बात मानने को तैयार न हो ताकि पहले तो इन चुनावों में भाजपा को झटके दर झटके दिए जा सकें और फिर 2024 में ऐसा किल्ला गाड़ा जा सके कि अगले 70 वर्षों तक भाजपा फिर कुर्सी को तरस जाए।
लेकिन करें तो क्या करें विपक्ष के इस भोलेपन का। इस पर हंसे या रोएं, समझ में नहीं आ रहा। समझ में आ रहा है तो सिर्फ इतना कि कैसे मोदी सरकार विपक्ष के भोलेपन का नाजायज़ लाभ अर्जित करती चली आ रही है और कैसे वैरायटी किसानों की ज़िद को भी निजी हित में मोड़ रही है।
अंत में यही समझकर लिखने का अंत करने को मन कर रहा है कि “सबसे भले वे मूढ़, जिन्हें न व्यापे जगत गति”। क्योंकि किसी के मुंह से सुना है- अत्यधिक भोलापन और मूढ़ता में बहुत अधिक फर्क नहीं है।
अंत में यही समझकर लिखने का अंत करने को मन कर रहा है कि “सबसे भले वे मूढ़, जिन्हें न व्यापे जगत गति”। क्योंकि किसी के मुंह से सुना है- अत्यधिक भोलापन और मूढ़ता में बहुत अधिक फर्क नहीं है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
Wednesday, 11 September 2019
पड़ोसी मुल्क के पाव-पाव सेर वाले एटम बम और हमारे ढाई-ढाई सौ ग्राम के वरिष्ठ पत्रकार, है कोई समानता ?
जैसे पड़ोसी मुल्क में पाव-पाव भर तथा आधा-आधा सेर के ‘परमाणु बम’ हैं, उसी प्रकार हमारे यहां ढाई-ढाई सौ ग्राम और आधा-आधा किलो के ‘वरिष्ठ पत्रकार’ हैं।
आप चाहें तो पूछ सकते हैं कि इन वरिष्ठ पत्रकारों की तुलना पड़ोसी मुल्क के परमाणु बमों से क्यों ?
तो इसका जवाब यह है कि जितने खतरनाक पड़ोसी मुल्क के ‘चवन्नी छाप’ परमाणु बम हैं, उससे ज्यादा नहीं तो कम खतरनाक ढाई-ढाई सौ ग्राम वाले हमारे ‘वरिष्ठ पत्रकार’ भी नहीं हैं।
दरअसल इन वरिष्ठ ‘युवा’ पत्रकारों में इतनी एनर्जी है, इतने विस्फोटक तत्व भरे हुए हैं कि पता नहीं ये कब, कहां और कैसे फट पड़ें।
अब जाहिर है कि फटेंगे तो किसी न किसी का नुकसान जरूर होगा।
मैं यहां पहले यह क्लीयर और कर दूं कि स्वतंत्र भारत में अब कोई ‘कनिष्ठ’ पत्रकार शायद ही शेष हो। आप मान सकते हैं कि इस किस्म की नस्ल विलुप्त न सही, विलुप्त प्राय तो हो ही चुकी है।
ऐसी धारणा बनाने का एक ठोस आधार यह है कि तीन दशक की सक्रिय पत्रकारिता में मुझे कहीं कोई ‘कनिष्ठ’ पत्रकार ढूंढे नहीं मिला।
18-20 का कोई एक हो या 20-20 के दो रहे हों, सबके सब वरिष्ठ पत्रकार ही पाए गए लिहाजा इस शोध से यह भी ज्ञात हुआ कि इस वरिष्ठता से उम्र का कोई नाता दूर-दूर तक नहीं है।
उदाहरण के लिए एक 55-60 साला पत्रकार यदि ऐसी ‘छोटी सोच’ रखता हो कि पत्रकारिता में हर वक्त कुछ न कुछ सीखने की गुंजाइश है, तो वह कभी ‘वरिष्ठ’ नहीं हो सकता।
ठीक इसके उलट जीवन के मात्र 35 वसंत देखने वाला कोई पत्रकार अगर यह ठान बैठे कि उसे किसी नई जानकारी की आवश्यकता नहीं है, उसके पास पत्रकारिता का ज्ञान बघारने को पर्याप्त मसाला एकत्र हो चुका है तो उसका ‘स्वयंभू’ वरिष्ठ हो जाना बनता है।
इसे समझने के लिए मैं खुद को पेश करता हूं। मुझे 01 सितंबर (जिस दिन से देश में नया व्हीकल एक्ट लागू हुआ) से पहले तक कतई पता नहीं था कि ‘गेयर वाला’ कोई ‘दुपहिया वाहन’ चप्पलें पहनकर, लुंगी या तहमद बांधकर… और यहां तक कि ‘निक्कर’ आदि पहनकर चलाने पर भी चालान कट सकता है।
चंद्रयान-2 की आंशिक असफलता से पूर्व मैंने नहीं पढ़ा था कि ‘लैंडर’ की भूमिका क्या होती है और क्यों उसका टेढ़ा-तिरछा होना पूरे देश पर भारी पड़ सकता है।
अर्थशास्त्र का विद्यार्थी होने के बावजूद मैंने कभी देश की अर्थव्यवस्था को लेकर ‘अर्थशास्त्रियों’ को चुनौती नहीं दी, कभी जीडीपी को लेकर निरर्थक बहस नहीं की। ‘रेपो रेट’ में बाल की खाल निकालना जरूरी नहीं समझा।
अब आप ही बताइए कि मैं कैसे वरिष्ठ हो सकता हूं जबकि मुझसे काफी छोटे पत्रकार सीधे-सीधे दिन रात चिल्ला-चिल्लाकर कहते हैं… देश को मंदी के गर्त में ले जानी वाली सरकार बताए कि उसने समय रहते इसे रोकने के उपाय क्यों नहीं किए। वित्तमंत्री को मंदी का पता तब क्यों चला, जब मीडिया ने उसे बताया कि मंदी की मार से आमलोग बेहाल हो रहे हैं।
वो बेखौफ होकर ये भी बताते हैं कि ऑटो इंडस्ट्री की इतनी खस्ता हालत कैसे बनी, ‘कारें’ क्यों नहीं बिक रहीं। ‘लिपिस्टिक’ ज्यादा बिकने से क्या संदेश मिलता है।
औरतें मंदी की मार को ठेंगा दिखाने के लिए कार की बजाय लिपिस्टिक, नेल कलर या हेयर बैंड खरीदने लगती हैं।
ये पत्रकार अर्थशास्त्रियों को बताते हैं कि औरतों का अचानक कारों पर से ध्यान हटाकर सीधे लिपिस्टिक, नेल कलर या हेयर बैंड पर फोकस करना इस बात का पुख्ता सबूत है कि आर्थिक मंदी घर कर चुकी है।
दुनियाभर के अर्थशास्त्री एक तरफ और वरिष्ठ पत्रकार दूसरी तरफ।
अर्थशास्त्री उनकी दृष्टि से घिसी-पिटी दलीलें देकर देश के साथ अनर्थ कर रहे हैं जबकि देश गर्त में जाने की ओर तेजी के साथ बढ़ रहा है।
कुछ वरिष्ठ पत्रकारों के पास तो इस बात के पुख्ता सबूत भी हैं कि देश गर्त में जा चुका है, बस घोषणा होना बाकी है।
इन वरिष्ठ पत्रकारों की मानें तो देश उसी प्रकार बेढंगे तरीके से पृथ्वी पर खुद की मौजूदगी का अहसास जबरन कराने में जुटा है, जिस प्रकार के. सिवन विक्रम लैंडर के चंद्रमा पर तिरछा जा पड़ने का अहसास करा रहे हैं।
कुछ ने तो के. सिवन को चुनौती देने के लिए इस आशय का खुला पत्र लिखकर तैयार रखा है कि जब आज तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर किसी ने अपना यान उतारने की कोशिश नहीं की तो आपने ये हिमाकत क्यों की।
क्यों देश का सेंकड़ों करोड़ रुपया बर्बाद कर दिया। इतने रुपयों से कितने वर्ष का मिड डे मील आ सकता था। किसानों के गन्ने का बकाया भुगतान किया जा सकता था। उनका कर्ज माफ किया जा सकता था। बीएसएनएल के कर्मचारियों का रुका हुआ वेतन दिया जा सकता था। ऐसा ही बहुत कुछ किया जा सकता था जो आपकी जिद की भेंट चढ़ गया।
एक वरिष्ठ पत्रकार तो यहां तक कह रहे थे कि हम आरटीआई के जरिए ISRO चीफ से ये जानकारी मांगेंगे कि क्या वो खुद कभी अंतरिक्ष की सैर पर निकले थे, और नहीं निकले तो उन्होंने एक अनजान व अज्ञात सफर पर देश का चंद्रयान-2 कैसे भेज दिया।
कल को कोई वरिष्ठ पत्रकार किसी ‘खास वकील’ के माध्यम से कोर्ट में ISRO चीफ के खिलाफ याचिका लेकर पहुंच जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
इन हालातों में मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि मैं अपनी तीन दशक की पत्रकारिता को ओढूं या बिछाऊं।
क्या के. सिवन को यहीं ISRO में छोड़कर चंद्रमा तक जाकर पता लगाऊं कि ऑर्बिटर के बारे में भी वो जो कुछ बता रहे हैं, वो सही है या नहीं।
या मैं भी आरटीआई भेजकर सरकार से पूछूं कि पाकिस्तान के पाव-पाव भर वाले एटम बमों और हमारे ढाई-ढाई सौ ग्राम के वरिष्ठ पत्रकारों में कोई समानता है। है तो उसकी विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराएं।
मुझे लगता है कि मैं मूढ़ था, मूढ़ हूं और ताजिंदगी मूढ़ ही रहूंगा। किसी ने मेरे जैसे ‘कनिष्ठ’ पत्रकारों के लिए उचित ही कहा है-
सबसे भले हैं मूढ़, जिन्हें न प्यापै जगत गति
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
आप चाहें तो पूछ सकते हैं कि इन वरिष्ठ पत्रकारों की तुलना पड़ोसी मुल्क के परमाणु बमों से क्यों ?
तो इसका जवाब यह है कि जितने खतरनाक पड़ोसी मुल्क के ‘चवन्नी छाप’ परमाणु बम हैं, उससे ज्यादा नहीं तो कम खतरनाक ढाई-ढाई सौ ग्राम वाले हमारे ‘वरिष्ठ पत्रकार’ भी नहीं हैं।
दरअसल इन वरिष्ठ ‘युवा’ पत्रकारों में इतनी एनर्जी है, इतने विस्फोटक तत्व भरे हुए हैं कि पता नहीं ये कब, कहां और कैसे फट पड़ें।
अब जाहिर है कि फटेंगे तो किसी न किसी का नुकसान जरूर होगा।
मैं यहां पहले यह क्लीयर और कर दूं कि स्वतंत्र भारत में अब कोई ‘कनिष्ठ’ पत्रकार शायद ही शेष हो। आप मान सकते हैं कि इस किस्म की नस्ल विलुप्त न सही, विलुप्त प्राय तो हो ही चुकी है।
ऐसी धारणा बनाने का एक ठोस आधार यह है कि तीन दशक की सक्रिय पत्रकारिता में मुझे कहीं कोई ‘कनिष्ठ’ पत्रकार ढूंढे नहीं मिला।
18-20 का कोई एक हो या 20-20 के दो रहे हों, सबके सब वरिष्ठ पत्रकार ही पाए गए लिहाजा इस शोध से यह भी ज्ञात हुआ कि इस वरिष्ठता से उम्र का कोई नाता दूर-दूर तक नहीं है।
उदाहरण के लिए एक 55-60 साला पत्रकार यदि ऐसी ‘छोटी सोच’ रखता हो कि पत्रकारिता में हर वक्त कुछ न कुछ सीखने की गुंजाइश है, तो वह कभी ‘वरिष्ठ’ नहीं हो सकता।
ठीक इसके उलट जीवन के मात्र 35 वसंत देखने वाला कोई पत्रकार अगर यह ठान बैठे कि उसे किसी नई जानकारी की आवश्यकता नहीं है, उसके पास पत्रकारिता का ज्ञान बघारने को पर्याप्त मसाला एकत्र हो चुका है तो उसका ‘स्वयंभू’ वरिष्ठ हो जाना बनता है।
इसे समझने के लिए मैं खुद को पेश करता हूं। मुझे 01 सितंबर (जिस दिन से देश में नया व्हीकल एक्ट लागू हुआ) से पहले तक कतई पता नहीं था कि ‘गेयर वाला’ कोई ‘दुपहिया वाहन’ चप्पलें पहनकर, लुंगी या तहमद बांधकर… और यहां तक कि ‘निक्कर’ आदि पहनकर चलाने पर भी चालान कट सकता है।
चंद्रयान-2 की आंशिक असफलता से पूर्व मैंने नहीं पढ़ा था कि ‘लैंडर’ की भूमिका क्या होती है और क्यों उसका टेढ़ा-तिरछा होना पूरे देश पर भारी पड़ सकता है।
अर्थशास्त्र का विद्यार्थी होने के बावजूद मैंने कभी देश की अर्थव्यवस्था को लेकर ‘अर्थशास्त्रियों’ को चुनौती नहीं दी, कभी जीडीपी को लेकर निरर्थक बहस नहीं की। ‘रेपो रेट’ में बाल की खाल निकालना जरूरी नहीं समझा।
अब आप ही बताइए कि मैं कैसे वरिष्ठ हो सकता हूं जबकि मुझसे काफी छोटे पत्रकार सीधे-सीधे दिन रात चिल्ला-चिल्लाकर कहते हैं… देश को मंदी के गर्त में ले जानी वाली सरकार बताए कि उसने समय रहते इसे रोकने के उपाय क्यों नहीं किए। वित्तमंत्री को मंदी का पता तब क्यों चला, जब मीडिया ने उसे बताया कि मंदी की मार से आमलोग बेहाल हो रहे हैं।
वो बेखौफ होकर ये भी बताते हैं कि ऑटो इंडस्ट्री की इतनी खस्ता हालत कैसे बनी, ‘कारें’ क्यों नहीं बिक रहीं। ‘लिपिस्टिक’ ज्यादा बिकने से क्या संदेश मिलता है।
औरतें मंदी की मार को ठेंगा दिखाने के लिए कार की बजाय लिपिस्टिक, नेल कलर या हेयर बैंड खरीदने लगती हैं।
ये पत्रकार अर्थशास्त्रियों को बताते हैं कि औरतों का अचानक कारों पर से ध्यान हटाकर सीधे लिपिस्टिक, नेल कलर या हेयर बैंड पर फोकस करना इस बात का पुख्ता सबूत है कि आर्थिक मंदी घर कर चुकी है।
दुनियाभर के अर्थशास्त्री एक तरफ और वरिष्ठ पत्रकार दूसरी तरफ।
अर्थशास्त्री उनकी दृष्टि से घिसी-पिटी दलीलें देकर देश के साथ अनर्थ कर रहे हैं जबकि देश गर्त में जाने की ओर तेजी के साथ बढ़ रहा है।
कुछ वरिष्ठ पत्रकारों के पास तो इस बात के पुख्ता सबूत भी हैं कि देश गर्त में जा चुका है, बस घोषणा होना बाकी है।
इन वरिष्ठ पत्रकारों की मानें तो देश उसी प्रकार बेढंगे तरीके से पृथ्वी पर खुद की मौजूदगी का अहसास जबरन कराने में जुटा है, जिस प्रकार के. सिवन विक्रम लैंडर के चंद्रमा पर तिरछा जा पड़ने का अहसास करा रहे हैं।
कुछ ने तो के. सिवन को चुनौती देने के लिए इस आशय का खुला पत्र लिखकर तैयार रखा है कि जब आज तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर किसी ने अपना यान उतारने की कोशिश नहीं की तो आपने ये हिमाकत क्यों की।
क्यों देश का सेंकड़ों करोड़ रुपया बर्बाद कर दिया। इतने रुपयों से कितने वर्ष का मिड डे मील आ सकता था। किसानों के गन्ने का बकाया भुगतान किया जा सकता था। उनका कर्ज माफ किया जा सकता था। बीएसएनएल के कर्मचारियों का रुका हुआ वेतन दिया जा सकता था। ऐसा ही बहुत कुछ किया जा सकता था जो आपकी जिद की भेंट चढ़ गया।
एक वरिष्ठ पत्रकार तो यहां तक कह रहे थे कि हम आरटीआई के जरिए ISRO चीफ से ये जानकारी मांगेंगे कि क्या वो खुद कभी अंतरिक्ष की सैर पर निकले थे, और नहीं निकले तो उन्होंने एक अनजान व अज्ञात सफर पर देश का चंद्रयान-2 कैसे भेज दिया।
कल को कोई वरिष्ठ पत्रकार किसी ‘खास वकील’ के माध्यम से कोर्ट में ISRO चीफ के खिलाफ याचिका लेकर पहुंच जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
इन हालातों में मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि मैं अपनी तीन दशक की पत्रकारिता को ओढूं या बिछाऊं।
क्या के. सिवन को यहीं ISRO में छोड़कर चंद्रमा तक जाकर पता लगाऊं कि ऑर्बिटर के बारे में भी वो जो कुछ बता रहे हैं, वो सही है या नहीं।
या मैं भी आरटीआई भेजकर सरकार से पूछूं कि पाकिस्तान के पाव-पाव भर वाले एटम बमों और हमारे ढाई-ढाई सौ ग्राम के वरिष्ठ पत्रकारों में कोई समानता है। है तो उसकी विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराएं।
मुझे लगता है कि मैं मूढ़ था, मूढ़ हूं और ताजिंदगी मूढ़ ही रहूंगा। किसी ने मेरे जैसे ‘कनिष्ठ’ पत्रकारों के लिए उचित ही कहा है-
सबसे भले हैं मूढ़, जिन्हें न प्यापै जगत गति
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
Friday, 30 August 2019
“गूंगे” ने “बहरे” से जो कुछ कहा, उसे “अंधे” ने देखा
चकरा गए न! मैं भी इसी प्रकार चकरा गया था जब उसने बिना किसी राम-राम या दुआ-सलाम के सीधे-सीधे मुझसे यही कहा था।
मैंने उससे कुछ बेरुखी के साथ पूछा- ये क्या बक रहे हो। ऐसा कैसे संभव है ?
वह भी उतनी ही बेरुखी बरतते हुए प्रत्युत्तर में बोला- संभव हो या असंभव… मुझे इससे क्या ?
मैं तो संविधान प्रदत्त अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहा हूं। इससे तुम्हें आपत्ति क्यों हो रही है?
इस बार मैंने उसे समझाने की कोशिश की- भाई मेरे, यह अभिव्यक्ति की आजादी नहीं हैं। इसे अफवाह फैलाना कहते हैं, और अफवाह फैलाना एक जुर्म है। अफवाह फैलाने वाले देश के दुश्मन होते हैं।
मेरे समझाने पर वह और भड़क उठा। कहने लगा- तुम इसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हो। ये है तुम्हारा लोकतंत्र, जहां मुझसे मेरी बोलने की आजादी छीनी जा रही है।
बोलने की ही क्यों… मेरे रहन-सहन की आजादी, खाने-पीने की आजादी, और तो और घूमने-फिरने की भी आजादी पर पाबंदी लगाई जा रही है।
मैंने उसकी भावनाओं का आदर करते हुए उससे यह जानने की कोशिश की कि आखिर तुम चाहते क्या हो, थोड़ा विस्तार में बताओ।
इस पर वह बोला- देखिए जनाब, मैं सिर्फ संविधान से प्राप्त अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहता हूं। और इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
मुझे मेरे भरोसेमंद सूत्रों ने जानकारी दी कि “गूंगे” ने “बहरे” से जो कुछ कहा, उसे “अंधे” ने देखा। अब मैं इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगों के बीच फैला देना चाहता हूं लेकिन आप जैसे लोग हैं कि मेरी जुबान पर भी लगाम लगाना चाहते हैं।
यह सुनकर अब मेरा धैर्य थोड़ा चुकने लगा तो मैंने उससे कहा- देखो भाई… संविधान ने बेशक देश के सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की, रहन-सहन की, खाने-पीने की और घूमने-फिरने की भी आजादी दी है परंतु हर आजादी की कोई सीमा तो होती ही है न।
संविधान में ऐसी किसी सीमा का कोई उल्लेख भले न हो परंतु इसके लिए हमें अपने बुद्धि-विवेक का प्रयोग खुद करना होता है। जो लोग खुद नहीं करते, उन्हें कानून कराता है। या यूं कहें कि कानून को कराना पड़ता है क्योंकि कोई भी आजादी अराजकता फैलाने का अधिकार नहीं देती।
जैसे कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कोई खुलेआम किसी को गाली तो नहीं दे सकता क्योंकि गाली देना अपराध कहलाता है। लोगों को भड़काने-उकसाने का काम भी नहीं कर सकता क्योंकि वह भी अपराध की श्रेणी में आता है।
इसी प्रकार संविधान ये भी अधिकार नहीं देता कि आप मुंह में हर वक्त पेट्रोल भरकर घूमते रहें ताकि जहां भी चिंगारी नजर आ जाए वहीं उसे आग के शोलों में तब्दील कर सकें। आप ऐसा करेंगे तो कानून भी अपना काम करेगा।
रहन-सहन की आजादी भी लोकतंत्र देता है परंतु इसका भी यह मतलब नहीं कि आप निर्वस्त्र निकल पड़ें और किसी के रोकने-टोकने पर दुहाई देने लगें संविधान की।
सरेआम निर्वस्त्र निकल पड़ने पर आपके साथ दो किस्म की दुर्घटनाएं हो सकती हैं। पहली कानून सम्मत और दूसरी वो जिसे आप जैसे लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहते हैं। मसलन जनता जनार्दन आपको ”पगलैट” समझकर दौड़ा सकती है। आपके ऊपर ईंट-पत्थर फेंक सकती है या ऐसा कुछ कर सकती है जिसे आप जैसा ”इलीट वर्ग” मॉब लिंंचिंग कहता है और आम आदमी जनाक्रोश। चुनाव आपका है, आप जिस तरह भी समझ सकें।
इसके बाद नंबर आता है खाने-पीने की आजादी का। तो भाई यहां भी कानूनन तय है कि आप कितनी आजादी के हकदार हैं। आप अपने घर में बैठकर निरामिष भोजन करें या आमिष यानी मांसाहारी अथवा शाकाहारी, ये आपका अधिकार है परंतु यदि आप कहें कि मैं तो बीच सड़क पर उसे काटकर और पकाकर ”गिद्ध-भोज” करूंगा तो ये अधिकारों का दुरुपयोग ही नहीं, कुत्सित एवं कुंठित मानसिकता का परिचायक भी होगा।
आपको अपने घर या कुछ निर्धारित स्थानों पर मदिरापान करने की भी आजादी है परंतु सार्वजनिक तौर पर नहीं।
आपको यह आजादी भी नहीं कि आप मदिरापान करके मनमर्जी करने लगें। किसी के भी कपड़े फाड़ दें या अपने कपड़े फाड़कर समाज को शर्मिंदा करें, क्योंकि लिमिट सबकी तय है। लिमिट क्रॉस की नहीं कि कानून अपना काम करने लगता है।
शेष रह जाती है बात घूमने-फिरने की आजादी की तो उसके लिए भी कहीं कोई रोक-टोक नहीं है, परंतु विषम परिस्थितियों में शांति व सद्भाव बनाए रखने के लिए कानून में ऐसे प्रावधान हैं जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है।
ऐसा इसलिए कि संविधान और लोकतंत्र ने सिर्फ अधिकार ही नहीं दिए, कुछ कर्तव्य भी निर्धारित किए हैं।
इन कर्तव्यों में हर इंसान के जीवन की रक्षा करना भी शामिल है। इसीलिए जीवन जीने का अधिकार तो सबको है परंतु जीवन लेने का किसी को नहीं। चाहे वह आपका खुद का ही क्यों न हो। ऐसा न होता तो ”खुदकुशी” भी अपराध न होता। वह एकमात्र ऐसा अपराध है जिसमें सफल हो जाने पर तो आदमी कानून से बच निकलता है परंतु असफल रहने पर शिकंजे में फंस जाता है।
आप कल को यह कहने लगें कि भाई जब जीवन मेरा है तो उसे छीनने का अधिकार मुझे क्यों नहीं है।
कुछ गुणी लोग इसके लिए कानून को चुनौती देते रहे हैं और देते रहेंगे किंतु फिलहाल खुदकुशी करने की कोशिश अथवा उसके लिए प्रेरित करना दोनों ही कृत्य अपराध हैं।
तो यार, न खुद खुदा से मिलने की इतनी जल्दी में रहो और न दूसरों को उसके लिए उकसाओ।
संविधान और लोकतंत्र से मिले अधिकारों का सम्मान करो व उनका लुत्फ उठाओ। अपमान करोगे तो अपमानित होना पड़ेगा।
संविधान प्रदत्त अधिकार हों या लोकतंत्र प्रदत्त, उनकी व्याख्या अपने मनमाफिक करने की कोशिश भी आत्मघात से कम नहीं है।
जितनी आजादी और जैसी आजादी मिली है, उसके लिए शुक्रिया अदा करो संविधान निर्माताओं का, लोकतंत्र का और उस जनता जनार्दन का जो तुम्हें ‘झेल’ रही है।
कानून को अपना काम करने दो क्योंकि वो भी संविधान की देन है। उसे भी आपके ही पूर्वजों ने स्थापित किया है। समय और परिस्थितियों को समझो।
सब-कुछ संविधान प्रदत्त नहीं होता, कुछ ईश्वर प्रदत्त भी होता है। ईश्वर ने बुद्धि-विवेक दिया है तो उसका भी थोड़ा इस्तेमाल कर लो और फिर सोचो कि क्या गूंगा बोल सकता है, क्या बहरा सुन सकता है, क्या अंधा देख सकता है ?
नहीं न…तो फिर ऐसी अफवाहें क्यों फैलाते हो। क्यों अभिव्यक्ति की आजादी का ढोल गले में लटकाकर देश का ढोल बजाने में लगे रहते हो।
क्यों रहने-खाने-पीने-घूमने-फिरने की आजादी के बहाने अपने दिमाग का दिवालियापन जाहिर करते हो।
याद रखो… ये जो जनता है, सब जानती है। तुम्हें भी और तुम्हारी हरकतों को भी।
कहते हैं किसी खास जीव को ”घी” हजम नहीं होता। बाकी आप समझदार हैं।
डिस्क्लेमर: यह कहावत हर उस व्यक्ति पर खरी उतर सकती है जो प्राप्त सुविधाओं का दुरुपयोग करने में लगा रहता है। सिर्फ अधिकारों की बात करता है, कर्तव्यों की नहीं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
मैंने उससे कुछ बेरुखी के साथ पूछा- ये क्या बक रहे हो। ऐसा कैसे संभव है ?
वह भी उतनी ही बेरुखी बरतते हुए प्रत्युत्तर में बोला- संभव हो या असंभव… मुझे इससे क्या ?
मैं तो संविधान प्रदत्त अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहा हूं। इससे तुम्हें आपत्ति क्यों हो रही है?
इस बार मैंने उसे समझाने की कोशिश की- भाई मेरे, यह अभिव्यक्ति की आजादी नहीं हैं। इसे अफवाह फैलाना कहते हैं, और अफवाह फैलाना एक जुर्म है। अफवाह फैलाने वाले देश के दुश्मन होते हैं।
मेरे समझाने पर वह और भड़क उठा। कहने लगा- तुम इसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हो। ये है तुम्हारा लोकतंत्र, जहां मुझसे मेरी बोलने की आजादी छीनी जा रही है।
बोलने की ही क्यों… मेरे रहन-सहन की आजादी, खाने-पीने की आजादी, और तो और घूमने-फिरने की भी आजादी पर पाबंदी लगाई जा रही है।
मैंने उसकी भावनाओं का आदर करते हुए उससे यह जानने की कोशिश की कि आखिर तुम चाहते क्या हो, थोड़ा विस्तार में बताओ।
इस पर वह बोला- देखिए जनाब, मैं सिर्फ संविधान से प्राप्त अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहता हूं। और इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
मुझे मेरे भरोसेमंद सूत्रों ने जानकारी दी कि “गूंगे” ने “बहरे” से जो कुछ कहा, उसे “अंधे” ने देखा। अब मैं इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगों के बीच फैला देना चाहता हूं लेकिन आप जैसे लोग हैं कि मेरी जुबान पर भी लगाम लगाना चाहते हैं।
यह सुनकर अब मेरा धैर्य थोड़ा चुकने लगा तो मैंने उससे कहा- देखो भाई… संविधान ने बेशक देश के सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की, रहन-सहन की, खाने-पीने की और घूमने-फिरने की भी आजादी दी है परंतु हर आजादी की कोई सीमा तो होती ही है न।
संविधान में ऐसी किसी सीमा का कोई उल्लेख भले न हो परंतु इसके लिए हमें अपने बुद्धि-विवेक का प्रयोग खुद करना होता है। जो लोग खुद नहीं करते, उन्हें कानून कराता है। या यूं कहें कि कानून को कराना पड़ता है क्योंकि कोई भी आजादी अराजकता फैलाने का अधिकार नहीं देती।
जैसे कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कोई खुलेआम किसी को गाली तो नहीं दे सकता क्योंकि गाली देना अपराध कहलाता है। लोगों को भड़काने-उकसाने का काम भी नहीं कर सकता क्योंकि वह भी अपराध की श्रेणी में आता है।
इसी प्रकार संविधान ये भी अधिकार नहीं देता कि आप मुंह में हर वक्त पेट्रोल भरकर घूमते रहें ताकि जहां भी चिंगारी नजर आ जाए वहीं उसे आग के शोलों में तब्दील कर सकें। आप ऐसा करेंगे तो कानून भी अपना काम करेगा।
रहन-सहन की आजादी भी लोकतंत्र देता है परंतु इसका भी यह मतलब नहीं कि आप निर्वस्त्र निकल पड़ें और किसी के रोकने-टोकने पर दुहाई देने लगें संविधान की।
सरेआम निर्वस्त्र निकल पड़ने पर आपके साथ दो किस्म की दुर्घटनाएं हो सकती हैं। पहली कानून सम्मत और दूसरी वो जिसे आप जैसे लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहते हैं। मसलन जनता जनार्दन आपको ”पगलैट” समझकर दौड़ा सकती है। आपके ऊपर ईंट-पत्थर फेंक सकती है या ऐसा कुछ कर सकती है जिसे आप जैसा ”इलीट वर्ग” मॉब लिंंचिंग कहता है और आम आदमी जनाक्रोश। चुनाव आपका है, आप जिस तरह भी समझ सकें।
इसके बाद नंबर आता है खाने-पीने की आजादी का। तो भाई यहां भी कानूनन तय है कि आप कितनी आजादी के हकदार हैं। आप अपने घर में बैठकर निरामिष भोजन करें या आमिष यानी मांसाहारी अथवा शाकाहारी, ये आपका अधिकार है परंतु यदि आप कहें कि मैं तो बीच सड़क पर उसे काटकर और पकाकर ”गिद्ध-भोज” करूंगा तो ये अधिकारों का दुरुपयोग ही नहीं, कुत्सित एवं कुंठित मानसिकता का परिचायक भी होगा।
आपको अपने घर या कुछ निर्धारित स्थानों पर मदिरापान करने की भी आजादी है परंतु सार्वजनिक तौर पर नहीं।
आपको यह आजादी भी नहीं कि आप मदिरापान करके मनमर्जी करने लगें। किसी के भी कपड़े फाड़ दें या अपने कपड़े फाड़कर समाज को शर्मिंदा करें, क्योंकि लिमिट सबकी तय है। लिमिट क्रॉस की नहीं कि कानून अपना काम करने लगता है।
शेष रह जाती है बात घूमने-फिरने की आजादी की तो उसके लिए भी कहीं कोई रोक-टोक नहीं है, परंतु विषम परिस्थितियों में शांति व सद्भाव बनाए रखने के लिए कानून में ऐसे प्रावधान हैं जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है।
ऐसा इसलिए कि संविधान और लोकतंत्र ने सिर्फ अधिकार ही नहीं दिए, कुछ कर्तव्य भी निर्धारित किए हैं।
इन कर्तव्यों में हर इंसान के जीवन की रक्षा करना भी शामिल है। इसीलिए जीवन जीने का अधिकार तो सबको है परंतु जीवन लेने का किसी को नहीं। चाहे वह आपका खुद का ही क्यों न हो। ऐसा न होता तो ”खुदकुशी” भी अपराध न होता। वह एकमात्र ऐसा अपराध है जिसमें सफल हो जाने पर तो आदमी कानून से बच निकलता है परंतु असफल रहने पर शिकंजे में फंस जाता है।
आप कल को यह कहने लगें कि भाई जब जीवन मेरा है तो उसे छीनने का अधिकार मुझे क्यों नहीं है।
कुछ गुणी लोग इसके लिए कानून को चुनौती देते रहे हैं और देते रहेंगे किंतु फिलहाल खुदकुशी करने की कोशिश अथवा उसके लिए प्रेरित करना दोनों ही कृत्य अपराध हैं।
तो यार, न खुद खुदा से मिलने की इतनी जल्दी में रहो और न दूसरों को उसके लिए उकसाओ।
संविधान और लोकतंत्र से मिले अधिकारों का सम्मान करो व उनका लुत्फ उठाओ। अपमान करोगे तो अपमानित होना पड़ेगा।
संविधान प्रदत्त अधिकार हों या लोकतंत्र प्रदत्त, उनकी व्याख्या अपने मनमाफिक करने की कोशिश भी आत्मघात से कम नहीं है।
जितनी आजादी और जैसी आजादी मिली है, उसके लिए शुक्रिया अदा करो संविधान निर्माताओं का, लोकतंत्र का और उस जनता जनार्दन का जो तुम्हें ‘झेल’ रही है।
कानून को अपना काम करने दो क्योंकि वो भी संविधान की देन है। उसे भी आपके ही पूर्वजों ने स्थापित किया है। समय और परिस्थितियों को समझो।
सब-कुछ संविधान प्रदत्त नहीं होता, कुछ ईश्वर प्रदत्त भी होता है। ईश्वर ने बुद्धि-विवेक दिया है तो उसका भी थोड़ा इस्तेमाल कर लो और फिर सोचो कि क्या गूंगा बोल सकता है, क्या बहरा सुन सकता है, क्या अंधा देख सकता है ?
नहीं न…तो फिर ऐसी अफवाहें क्यों फैलाते हो। क्यों अभिव्यक्ति की आजादी का ढोल गले में लटकाकर देश का ढोल बजाने में लगे रहते हो।
क्यों रहने-खाने-पीने-घूमने-फिरने की आजादी के बहाने अपने दिमाग का दिवालियापन जाहिर करते हो।
याद रखो… ये जो जनता है, सब जानती है। तुम्हें भी और तुम्हारी हरकतों को भी।
कहते हैं किसी खास जीव को ”घी” हजम नहीं होता। बाकी आप समझदार हैं।
डिस्क्लेमर: यह कहावत हर उस व्यक्ति पर खरी उतर सकती है जो प्राप्त सुविधाओं का दुरुपयोग करने में लगा रहता है। सिर्फ अधिकारों की बात करता है, कर्तव्यों की नहीं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
Friday, 23 August 2019
बेचारे ‘खिलाड़ी’ को ‘मदारी’ ने “लॉलीपॉप” दिखाकर बना दिया “बड़े वाला”
बेचारे मियां बड़ी हसरतों के साथ झोली उठाकर अमेरिका पहुंचे थे। सोच रहे थे कि ”दे दाता के नाम तुझको अल्ला रखे” की तर्ज पर उससे फरियाद करेंगे और झोली भरकर लौट आएंगे।
उन्हें शायद इस बात का इल्म ही नहीं था कि अमेरिका में उनका वास्ता सृष्टि के जिस जीव से पड़ने वाला है, वह राष्ट्रपति होने से पहले बहुत स्याना व्यापारी भी है। वह उनकी तरह खिलाड़ी नहीं है, मदारी है।
मदारी ने खिलाड़ी को दूर एक लॉलीपॉप दिखाई, और कहा कि यदि तुम तालिबान को हमसे समझौता वार्ता की टेबल पर ले आओ तो वह लॉलीपॉप तुम्हारी। लॉलीपॉप देखकर मियां इमरान के मुंह में पानी आ गया। लार टपकने लगी।
टपकती लार लेकर अपने मुल्क वापस लौटे तो बोले, ऐसा लग रहा है जैसे विश्वकप जीतकर आया हूं।
इधर जब भारत को पता लगा कि मदारी ने खिलाड़ी को उंगली के इशारे से लॉलीपॉप दिखा दी है तो भारत के मुखिया ने सबसे पहले मदारी को दो टूक समझाया।
कहा, देखो जनाब…प्रथम तो हम अपने पड़ोसी की तरह टाइमपास नेता नहीं हैं। और दूसरे गुजराती हैं। अगर राजनीति को व्यापार समझने की भूल कर रहे हो तो भी जान लो कि व्यापार हमारे रग-रग में बसा है। जिस लॉलीपॉप को दिखाकर तुम मियां इमरान से सौदेबाजी करने में लगे हो, वैसी लॉलीपॉप तो हम चाट-चाट कर फेंक देते हैं।
इतना कुछ कहने के बाद भी भारत को कुछ मजा नहीं आया। संतुष्टि नहीं मिली, तो उसने सोचा कि क्यों न खिलाड़ी और मदारी दोनों को एक जोर का झटका दिया जाए।
बताया जाए कि कुल जमा चार सौ साल की उम्र वाले एक देश और मात्र 70-72 साल के एक मुल्क की सोच पर हजारों साल पुराना भारत कितना भारी पड़ सकता है।
भारत ने एक झटके में लॉलीपॉप की डंडी तोड़ी और उसे नाली में फेंक दिया। जैसे कह रहा हो कि लो अब उठा सको तो उठा लो। अब दोनों मिलकर कचरे में ढूंढते रहना लॉलीपॉप को लेकिन लॉलीपॉप मिलने से रही क्योंकि जब तक तुम उसे ढूंढने नाली में उतरोगे तब तक वह गलकर बराबर हो लेगी।
भारत की इस चाल को न तो खुद को खुदा समझने वाला मदारी समझ पाया और न उसकी उंगली पर नाचने वाला जमूरा। एक झटके में सारी स्यानपत निकाल दी भारत ने। ऊपर से इस्लामाबाद में पोस्टर और लगवा दिया कि अब पीओके को संभाल सको तो संभालो। वैसे वो है तो हमारा ही, इसलिए लेकर भी हम ही रहेंगे।
अब बेचारा मदारी अपनी सफाई देने में लगा है और खिलाड़ी को उसके देश में लानत झेलनी पड़ रही है। लोग खुलेआम कह रहे हैं कि मियां… तुमसे ना हो पाएगा।
तुम तो सरकारी आवास को बारात घर बनाने और कबाड़ बेचकर जुगाड़ करने के ही लायक हो। कबाड़ बेचकर अपना घर भले ही चला लेना, पर देश यूं न चला करता। उसके लिए चाहिए अच्छा-खासा दिमाग, दिमाग तुम्हारे पास है नहीं। ऐसे में लॉलीपॉप को दूरबीन से देख तो सकते हो, लेकिन उसका स्वाद चखने को नहीं मिलना।
खैर, अब तो न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम। ऊपर से जलते तवे पर तसरीफ का टोकरा भी रखना पड़ रहा है। जब फुरसत मिले तो किसी कोने में जाकर तसरीफ पर पड़े फफोले चैक कर लेना। फिर बताना कि कितने हैं। मरहम हम भेज देंगे। आहिस्ता-आहिस्ता मलते रहना तब तक, जब तक कि मियां नवाज शरीफ के बग़लगीर न हो जाओ। खुदा खैर करे।
क्योंकि तुम्हारे ही लोग अब तो तुम्हारे मुंह पर थूककर कहने भी लगे हैं कि तुम्हें मदारी ने बड़े वाला बना दिया मियां।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
उन्हें शायद इस बात का इल्म ही नहीं था कि अमेरिका में उनका वास्ता सृष्टि के जिस जीव से पड़ने वाला है, वह राष्ट्रपति होने से पहले बहुत स्याना व्यापारी भी है। वह उनकी तरह खिलाड़ी नहीं है, मदारी है।
मदारी ने खिलाड़ी को दूर एक लॉलीपॉप दिखाई, और कहा कि यदि तुम तालिबान को हमसे समझौता वार्ता की टेबल पर ले आओ तो वह लॉलीपॉप तुम्हारी। लॉलीपॉप देखकर मियां इमरान के मुंह में पानी आ गया। लार टपकने लगी।
टपकती लार लेकर अपने मुल्क वापस लौटे तो बोले, ऐसा लग रहा है जैसे विश्वकप जीतकर आया हूं।
इधर जब भारत को पता लगा कि मदारी ने खिलाड़ी को उंगली के इशारे से लॉलीपॉप दिखा दी है तो भारत के मुखिया ने सबसे पहले मदारी को दो टूक समझाया।
कहा, देखो जनाब…प्रथम तो हम अपने पड़ोसी की तरह टाइमपास नेता नहीं हैं। और दूसरे गुजराती हैं। अगर राजनीति को व्यापार समझने की भूल कर रहे हो तो भी जान लो कि व्यापार हमारे रग-रग में बसा है। जिस लॉलीपॉप को दिखाकर तुम मियां इमरान से सौदेबाजी करने में लगे हो, वैसी लॉलीपॉप तो हम चाट-चाट कर फेंक देते हैं।
इतना कुछ कहने के बाद भी भारत को कुछ मजा नहीं आया। संतुष्टि नहीं मिली, तो उसने सोचा कि क्यों न खिलाड़ी और मदारी दोनों को एक जोर का झटका दिया जाए।
बताया जाए कि कुल जमा चार सौ साल की उम्र वाले एक देश और मात्र 70-72 साल के एक मुल्क की सोच पर हजारों साल पुराना भारत कितना भारी पड़ सकता है।
भारत ने एक झटके में लॉलीपॉप की डंडी तोड़ी और उसे नाली में फेंक दिया। जैसे कह रहा हो कि लो अब उठा सको तो उठा लो। अब दोनों मिलकर कचरे में ढूंढते रहना लॉलीपॉप को लेकिन लॉलीपॉप मिलने से रही क्योंकि जब तक तुम उसे ढूंढने नाली में उतरोगे तब तक वह गलकर बराबर हो लेगी।
भारत की इस चाल को न तो खुद को खुदा समझने वाला मदारी समझ पाया और न उसकी उंगली पर नाचने वाला जमूरा। एक झटके में सारी स्यानपत निकाल दी भारत ने। ऊपर से इस्लामाबाद में पोस्टर और लगवा दिया कि अब पीओके को संभाल सको तो संभालो। वैसे वो है तो हमारा ही, इसलिए लेकर भी हम ही रहेंगे।
अब बेचारा मदारी अपनी सफाई देने में लगा है और खिलाड़ी को उसके देश में लानत झेलनी पड़ रही है। लोग खुलेआम कह रहे हैं कि मियां… तुमसे ना हो पाएगा।
तुम तो सरकारी आवास को बारात घर बनाने और कबाड़ बेचकर जुगाड़ करने के ही लायक हो। कबाड़ बेचकर अपना घर भले ही चला लेना, पर देश यूं न चला करता। उसके लिए चाहिए अच्छा-खासा दिमाग, दिमाग तुम्हारे पास है नहीं। ऐसे में लॉलीपॉप को दूरबीन से देख तो सकते हो, लेकिन उसका स्वाद चखने को नहीं मिलना।
खैर, अब तो न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम। ऊपर से जलते तवे पर तसरीफ का टोकरा भी रखना पड़ रहा है। जब फुरसत मिले तो किसी कोने में जाकर तसरीफ पर पड़े फफोले चैक कर लेना। फिर बताना कि कितने हैं। मरहम हम भेज देंगे। आहिस्ता-आहिस्ता मलते रहना तब तक, जब तक कि मियां नवाज शरीफ के बग़लगीर न हो जाओ। खुदा खैर करे।
क्योंकि तुम्हारे ही लोग अब तो तुम्हारे मुंह पर थूककर कहने भी लगे हैं कि तुम्हें मदारी ने बड़े वाला बना दिया मियां।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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